चांद किसका है? ट्रंप के ‘चांद हमारा है’ वाले दावे के बीच समझिए क्या कहता है अंतरराष्ट्रीय कानून

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नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ‘चांद हमारा है’ वाले बयान के बाद अंतरिक्ष पर मालिकाना हक को लेकर कानूनी बहस तेज हो गई है। सवाल यह है कि क्या कोई देश चांद पर झंडा लगाकर या वहां बेस बनाकर उसके किसी हिस्से पर अपना अधिकार जता सकता है? क्या चांद से पानी, बर्फ और खनिज निकालना कानूनी है? और अगर संसाधन निकाले जाते हैं तो उन पर अधिकार किसका होगा? इन सवालों का जवाब अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून में मिलता है।

ट्रंप ने 6 सितंबर को किया था चांद पर दावा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 6 सितंबर को सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर लिखा था कि चांद हमारा है। इस पोस्ट के साथ चांद की सतह की एक तस्वीर साझा की गई थी, जिसमें अमेरिकी झंडा दिखाई दे रहा था। इसके अलावा अमेरिकी अंतरिक्ष बल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनाई गई कई तस्वीरें भी पोस्ट की गई थीं।

अमेरिका चांद की खोज में प्रमुख देशों में रहा है, लेकिन चांद पर मालिकाना हक का दावा अंतरराष्ट्रीय कानून के सामने अलग सवाल खड़ा करता है। मौजूदा कानून के मुताबिक कोई भी देश चांद पर झंडा लगाने, बेस बनाने या किसी क्षेत्र का इस्तेमाल करने भर से उस पर संप्रभु अधिकार हासिल नहीं कर सकता।

1967 की बाहरी अंतरिक्ष संधि सबसे अहम आधार

चांद से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज 1967 की बाहरी अंतरिक्ष संधि है। यह संधि शीत युद्ध के दौर में बनी थी। उस समय अमेरिका और सोवियत संघ के बीच अंतरिक्ष में बढ़त हासिल करने की होड़ चल रही थी। दोनों देश यह नहीं चाहते थे कि कोई राष्ट्र चांद या बाहरी अंतरिक्ष के किसी हिस्से पर कब्जा कर ले।

संधि के अनुच्छेद 2 में स्पष्ट किया गया है कि बाहरी अंतरिक्ष, जिसमें चांद और दूसरे आकाशीय पिंड शामिल हैं, संप्रभुता, कब्जे या किसी अन्य तरीके से किसी देश की संपत्ति नहीं बन सकते। इसका मतलब है कि किसी जगह पर झंडा लगाना, वैज्ञानिक केंद्र स्थापित करना या वहां लगातार गतिविधियां करना उस क्षेत्र का मालिकाना हक नहीं देता।

सभी देशों के हित में होना चाहिए अंतरिक्ष का इस्तेमाल

बाहरी अंतरिक्ष संधि के अनुच्छेद 1 में अंतरिक्ष के इस्तेमाल को लेकर व्यापक सिद्धांत दिया गया है। इसके अनुसार चांद समेत बाहरी अंतरिक्ष की खोज और उसका इस्तेमाल सभी देशों के हित में होना चाहिए। सभी देशों को समान आधार पर वहां पहुंचने, खोज करने और इस्तेमाल करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

संधि में निजी कंपनियों की गतिविधियों को लेकर भी देशों की जिम्मेदारी तय की गई है। कोई निजी कंपनी अंतरिक्ष में गतिविधि करती है तो उसके लिए संबंधित देश जिम्मेदार होगा। यानी अमेरिकी कंपनी चांद पर कोई गतिविधि करती है तो अंतरराष्ट्रीय कानून के स्तर पर उसकी जिम्मेदारी अमेरिका की होगी।

मालिकाना हक नहीं, लेकिन खनन पर अब भी सवाल

चांद की जमीन पर मालिकाना हक का दावा प्रतिबंधित है, लेकिन चांद से निकाले गए पानी, बर्फ, खनिज या धातुओं के मालिकाना हक का सवाल उतना स्पष्ट नहीं है। बाहरी अंतरिक्ष संधि इस बारे में विस्तृत व्यावसायिक व्यवस्था नहीं देती।

अमेरिका ने 2015 में कमर्शियल स्पेस लॉन्च कॉम्पिटिटिवनेस एक्ट के जरिए अपने नागरिकों को अंतरिक्ष से संसाधन निकालने और उनका व्यावसायिक इस्तेमाल करने का अधिकार दिया। हालांकि, इस कानून में यह भी स्पष्ट किया गया है कि संसाधनों के इस्तेमाल का अधिकार किसी आकाशीय पिंड पर अमेरिकी संप्रभुता या मालिकाना हक नहीं बनाता।

यानी चांद की जमीन और वहां से निकाले गए संसाधनों के बीच अंतर किया गया है। चांद की जमीन पर किसी देश का मालिकाना हक नहीं होगा, जबकि निकाला गया संसाधन निकालने वाले का हो सकता है।

नासा के आर्टेमिस मिशन में संसाधनों के इस्तेमाल पर जोर

नासा ने चांद के भविष्य के अभियानों में संसाधनों के इस्तेमाल को भी शामिल किया है। 2020 में आर्टेमिस कार्यक्रम के तहत चांद से संसाधन जुटाने के लिए निजी कंपनियों का चयन किया गया था।

चांद के ध्रुवीय इलाकों में पानी की बर्फ को खास तौर पर महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे पीने के पानी, ऑक्सीजन और रॉकेट ईंधन में बदला जा सकता है। वहीं खनिज और धातुएं भविष्य में चांद पर ठिकाने बनाने, मशीनों और निर्माण कार्यों में उपयोगी हो सकती हैं। हालांकि बड़े पैमाने पर खनन के लिए जरूरी तकनीक और आर्थिक मॉडल अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुए हैं।

आर्टेमिस समझौते में सुरक्षा क्षेत्र का भी प्रावधान

नासा ने 2020 में आर्टेमिस समझौते शुरू किए थे। यह औपचारिक अंतरराष्ट्रीय संधि नहीं, बल्कि दिशा-निर्देशों का एक समूह है। इसका उद्देश्य चांद और अन्य अंतरिक्ष अभियानों को शांतिपूर्ण, पारदर्शी और समन्वित तरीके से आगे बढ़ाना है।

समझौते में बाहरी अंतरिक्ष संधि के सिद्धांतों को स्वीकार करते हुए चांद, मंगल और क्षुद्रग्रहों से संसाधन निकालने और उनका इस्तेमाल करने की संभावना को मान्यता दी गई है, बशर्ते इससे किसी क्षेत्र पर मालिकाना दावा न किया जाए।

मिशनों के आसपास सुरक्षा क्षेत्र बनाने की भी व्यवस्था है। इसका उद्देश्य किसी क्षेत्र पर मालिकाना हक स्थापित करना नहीं, बल्कि एक मिशन की गतिविधियों में दूसरे मिशन के हस्तक्षेप को रोकना है। समझौते में देशों से अपनी अंतरिक्ष गतिविधियों की जानकारी साझा करने और जरूरत पड़ने पर आपसी समन्वय की अपेक्षा की गई है।

नासा के अनुसार 31 अगस्त 2026 को तुर्की आर्टेमिस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला 71वां देश बना। ये समझौते 1967 की बाहरी अंतरिक्ष संधि की जगह नहीं लेते, बल्कि उसके सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप देने की कोशिश करते हैं।

1979 का मून समझौता संसाधनों को लेकर ज्यादा सख्त

चांद के संसाधनों से जुड़ा एक अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज 1979 का मून समझौता है। इसमें चांद और उसके संसाधनों को ‘मानव जाति की साझी विरासत’ बताया गया है।

इस समझौते के मुताबिक कोई देश या कंपनी चांद के संसाधनों को निकाले बिना उनका मालिक नहीं बन सकती। व्यावसायिक खनन के लिए एक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाए जाने की बात कही गई है, ताकि इससे होने वाला आर्थिक और वैज्ञानिक लाभ सभी देशों तक पहुंच सके।

हालांकि, इस समझौते को बहुत कम देशों का समर्थन मिला है। अमेरिका ने इसे स्वीकार नहीं किया है और बड़ी अंतरिक्ष शक्तियां भी इससे दूर रही हैं। यही वजह है कि चांद पर व्यावसायिक खनन को लेकर इसकी व्यावहारिक भूमिका सीमित रही है।

चांद से निकाला गया पानी या खनिज किसका होगा?

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून चांद की जमीन के मालिकाना हक और वहां से निकाले गए संसाधनों के बीच अंतर करता है। बाहरी अंतरिक्ष संधि किसी देश को चांद के किसी हिस्से का मालिक बनने से रोकती है, लेकिन खनन के बाद निकले पानी, खनिज या दूसरी सामग्रियों के स्वामित्व के लिए विस्तृत व्यावसायिक नियम मौजूद नहीं हैं।

इसी वजह से इस मुद्दे पर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है। एक पक्ष का मानना है कि संसाधन निकालना अपने आप में संप्रभुता का दावा नहीं है, बशर्ते गतिविधि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत हो। दूसरी ओर यह तर्क दिया जाता है कि व्यापक व्यावसायिक छूट से अंतरिक्ष के इस्तेमाल को सभी देशों के हित में रखने वाला मूल सिद्धांत कमजोर हो सकता है।

चांद पर भविष्य में बढ़ सकता है कानूनी विवाद

चांद के संसाधन अब सिर्फ वैज्ञानिक चर्चा का विषय नहीं हैं। पानी की बर्फ, खनिज और धातुओं को भविष्य की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में अगर कोई देश या निजी कंपनी किसी संसाधन-समृद्ध क्षेत्र में लंबे समय तक काम करती है तो यह सवाल उठ सकता है कि कहीं वह क्षेत्र व्यवहार में उसके नियंत्रण में तो नहीं जा रहा।

फिलहाल कानूनी स्थिति का एक हिस्सा स्पष्ट है। कोई भी देश चांद पर झंडा लगाकर या वहां बेस बनाकर उसे अपनी संपत्ति नहीं बता सकता। वहीं चांद के पानी, बर्फ और खनिजों के व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर अंतरराष्ट्रीय कानून में अभी भी कई सवाल खुले हैं। अंतरिक्ष गतिविधियों के बढ़ने के साथ इन्हीं सवालों की व्याख्या भविष्य में और महत्वपूर्ण होने वाली है।

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