पीएम मोदी की काशी में भाजपा को अपनों से ही झटका! दोनों एमएलसी सीटों पर लगातार दूसरी हार ने बढ़ाई चिंता

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वाराणसी: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक दोनों सीटों पर भाजपा को लगातार दूसरी बार हार का सामना करना पड़ा है। इस बार पार्टी की हार का अंतर पहले से भी अधिक रहा। लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद भी भाजपा अपनी रणनीति में अपेक्षित सुधार नहीं कर सकी। अब इस हार ने पार्टी के संगठन और कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। चार महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले यह नतीजा भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

वाराणसी निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले आठ जिलों में भाजपा और उसके सहयोगी दलों के एक केंद्रीय मंत्री सहित 11 मंत्री और 33 विधायक हैं। इसके बावजूद विपक्षी उम्मीदवारों की बड़े अंतर से जीत ने पार्टी के भीतर तालमेल और संभावित भितरघात को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़े संगठन का दावा करने वाली भाजपा के दोनों प्रत्याशियों की लगातार दूसरी हार ने नेतृत्व की रणनीति पर भी सवाल उठाए हैं।

पार्टी के नेता अब हार की समीक्षा करने की बात कह रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि समीक्षा का नतीजा क्या निकलेगा? लोकसभा चुनाव के बाद भी हार और जीत के अंतर की समीक्षा की गई थी। उस समय जवाबदेही तय की गई होती तो शायद पार्टी को इस स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। अब देखना होगा कि विधानसभा चुनाव से पहले संगठन अपनी कमियों को दूर कर पाता है या नहीं।

पदाधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं हुई

हाल के दिनों में भाजपा ने प्रदेश, काशी क्षेत्र, महानगर और जिला स्तर पर नए पदाधिकारियों की घोषणा की है। विभिन्न मोर्चों में भी नियुक्तियां की जा रही हैं, लेकिन एमएलसी चुनाव के दौरान किसी भी स्तर पर नेताओं या कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी स्पष्ट नहीं की गई। न तो चुनाव के लिए प्रभावी प्रभारी बनाए गए और न ही किसी नेता को प्रत्याशियों की जीत सुनिश्चित करने का जिम्मा सौंपा गया।

मुख्यमंत्री की दो जनसभाएं भी पार्टी के उम्मीदवारों के पक्ष में अपेक्षित माहौल नहीं बना सकीं। संगठन के पास नेताओं और पदाधिकारियों की लंबी फौज होने के बावजूद चुनाव में उसका असर नजर नहीं आया।

जनप्रतिनिधियों की उदासीनता भी बनी वजह

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने काशी में दो दिन तक प्रवास किया था। इस दौरान उन्होंने जनप्रतिनिधियों, पूर्व जनप्रतिनिधियों, पदाधिकारियों और पुराने कार्यकर्ताओं से अलग-अलग बातचीत की थी। उन्होंने साफ कहा था कि एमएलसी चुनाव में जीत विधानसभा चुनाव की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण होगी। इसलिए सभी मतदाताओं तक पहुंचने की जरूरत है।

हालांकि चुनाव परिणाम से साफ हुआ कि पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने उनके निर्देशों पर गंभीरता से अमल नहीं किया। जनप्रतिनिधियों की उदासीनता भी हार की प्रमुख वजहों में शामिल मानी जा रही है।

बैठकों तक ही सीमित रह गया चुनाव प्रचार

एमएलसी चुनाव में जीत के लिए भाजपा ने कई बैठकें कीं। शीर्ष नेताओं ने कार्यकर्ताओं को मतदाताओं के बीच पहुंचकर समर्थन जुटाने के निर्देश दिए, लेकिन जमीनी स्तर पर प्रचार की रफ्तार कमजोर रही। पार्टी की गतिविधियां बैठकों तक ही सीमित रह गईं।

वरुणापार के पांडेयपुर क्षेत्र के एक शिक्षक मतदाता ने बताया कि उनकी पहचान भाजपा के कई बड़े नेताओं से है, लेकिन किसी ने भी उनसे पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करने की अपील नहीं की। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पार्टी का संपर्क अभियान मतदाताओं तक कितनी मजबूती से पहुंचा।

प्रत्याशियों के नाम घोषित करने में हुई देरी

भाजपा की हार की एक बड़ी वजह प्रत्याशियों के चयन और घोषणा में देरी को भी माना जा रहा है। राजनीतिक हलकों में पार्टी की ओर से उम्मीदवारों के नाम अंतिम समय तक घोषित करने की चर्चा रहती है। विधान परिषद चुनाव में भी यही स्थिति देखने को मिली।

प्रत्याशी चयन के लिए शीर्ष नेतृत्व ने सभी जिलों से नाम मांगे थे। जनप्रतिनिधियों से सुझाव लिए गए और पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने अपने स्तर पर भी जानकारी जुटाई। सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवारों के नामों पर विचार किया गया। इस पूरी प्रक्रिया में काफी समय लग गया।

इस देरी से महीनों पहले से तैयारी कर रहे कई दावेदार नाराज हो गए। इसका असर चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन पर भी पड़ा। इसके अलावा प्रत्याशियों का मतदाताओं से संपर्क भी कमजोर रहा। कई मतदाताओं तक उम्मीदवार मतदान के दिन तक नहीं पहुंच पाए। इससे नाराज होकर पार्टी से जुड़े कुछ शिक्षक और स्नातक मतदाताओं ने मतदान से दूरी बना ली।

शिक्षक प्रत्याशी के चयन पर पार्टी में असंतोष

शिक्षक सीट पर भाजपा की ओर से डॉ. प्रमोद कुमार मिश्र का नाम घोषित होने के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष की चर्चा शुरू हो गई थी। कुछ कार्यकर्ताओं का कहना था कि जो व्यक्ति लंबे समय तक भाजपा के खिलाफ चुनावी मैदान में रहा, उसे नामांकन से कुछ दिन पहले पार्टी का उम्मीदवार बना दिया गया।

कार्यकर्ताओं के एक वर्ग का मानना था कि शिक्षक प्रत्याशी का चयन उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हुआ। इस नाराजगी का असर भी चुनाव परिणाम पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

मतदाता सूची के पुनरीक्षण से भी दूर रहे दावेदार

चुनाव में प्रत्याशियों की घोषणा का इंतजार कर रहे कई दावेदार मतदाता सूची के पुनरीक्षण कार्य में सक्रिय नहीं हुए। जबकि निर्वाचन आयोग ने करीब एक साल पहले ही यह प्रक्रिया शुरू करा दी थी। उम्मीदवारों के नाम घोषित होने तक काफी देर हो चुकी थी।

इसके उलट विपक्षी दलों के नेता मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान सक्रिय रहे। उन्होंने एक-एक मतदाता से संपर्क किया और सोशल मीडिया तथा व्हाट्सऐप के माध्यम से भी प्रचार जारी रखा। भाजपा की ओर से इस स्तर पर सक्रियता नहीं दिखने को हार की एक अहम वजह माना जा रहा है।

अवैध मतपत्रों की संख्या भाजपा उम्मीदवारों के पक्ष में सबसे ज्यादा

चुनाव में अवैध मतों की संख्या भाजपा के उम्मीदवारों के मामले में सबसे अधिक रही। इसे पार्टी के कमजोर संपर्क अभियान और मतदाताओं को मतदान की प्रक्रिया की सही जानकारी नहीं देने से जोड़कर देखा जा रहा है।

मतगणना के दौरान बड़ी संख्या में शिक्षक मतदाताओं ने भाजपा प्रत्याशी के सामने वरीयता दर्ज करने में गलतियां कीं, जिससे उनके मत अवैध हो गए। इससे यह सवाल भी उठा कि पार्टी के नेताओं और उम्मीदवारों ने अपने मतदाताओं को मतदान की प्रक्रिया समझाने के लिए पर्याप्त प्रयास क्यों नहीं किए।

 

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