कच्चे तेल में लगी आग! ब्रेंट 110 डॉलर के करीब पहुंचा, कीमतों पर लगाम लगाने के लिए अमेरिका खोलेगा आपात तेल भंडार

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वाशिंगटन: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं ने दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। ब्रेंट क्रूड करीब 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है, जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड का भाव भी 100 डॉलर के पार निकल गया है। बढ़ती कीमतों पर काबू पाने और बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए अमेरिका अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार से 1.7 करोड़ बैरल कच्चा तेल उपलब्ध कराने की तैयारी कर रहा है। इस कदम का उद्देश्य तत्काल आपूर्ति बढ़ाकर कीमतों में तेजी के दबाव को कम करना है।

ब्रेंट क्रूड में 3.72 प्रतिशत की तेजी, डब्ल्यूटीआई भी चढ़ा

अंतरराष्ट्रीय बाजार में शनिवार को कच्चे तेल की कीमतों में जोरदार तेजी दर्ज की गई। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी डब्ल्यूटीआई क्रूड 3.51 प्रतिशत बढ़कर 101.40 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। वहीं, ब्रेंट क्रूड का भाव 3.72 प्रतिशत उछलकर करीब 110 डॉलर प्रति बैरल हो गया।

कच्चे तेल की कीमतों में इस तेजी से उन देशों की चिंता बढ़ गई है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए दूसरे देशों से तेल खरीदते हैं। भारत भी अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का असर देश के आयात खर्च और ईंधन बाजार पर पड़ सकता है।

ईरान के साथ युद्ध और होर्मुज में बाधाओं से बढ़ा संकट

कच्चे तेल की कीमतों में तेजी की प्रमुख वजह वैश्विक आपूर्ति को लेकर बढ़ती आशंकाएं हैं। ईरान के साथ अमेरिका के युद्ध और खाड़ी क्षेत्र में जहाजों पर हमलों के कारण तेल की आवाजाही प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है। इसके अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुई बाधाएं भी बाजार पर दबाव डाल रही हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के प्रमुख समुद्री तेल मार्गों में शामिल है। यहां से तेल की आपूर्ति बाधित होने पर कई देशों तक कच्चे तेल की पहुंच प्रभावित हो सकती है। आपूर्ति में संभावित कमी की आशंका के कारण कारोबारी पहले से खरीदारी बढ़ा देते हैं, जिससे कीमतों में तेजी आ सकती है।

इसी दबाव को कम करने के लिए अमेरिकी सरकार आपात भंडार से अतिरिक्त तेल बाजार में लाने की तैयारी कर रही है।

अमेरिका की योजना क्या है, कैसे मिलेगा बाजार को तेल?

अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने शुक्रवार को तेल की अदला-बदली से जुड़ी नई व्यवस्था के तहत कंपनियों से प्रस्ताव मांगे। इस योजना के अंतर्गत कंपनियां सरकार के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार से फिलहाल तेल ले सकेंगी और निर्धारित शर्तों के अनुसार बाद में उसे वापस करेंगी।

अमेरिका का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार आपात परिस्थितियों के लिए बनाया गया है। युद्ध, ऊर्जा संकट या तेल की आपूर्ति में बड़ी रुकावट आने पर सरकार इस भंडार का इस्तेमाल बाजार में उपलब्धता बढ़ाने के लिए कर सकती है।

इस बार करीब 1.7 करोड़ बैरल कच्चा तेल उपलब्ध कराने की तैयारी है। कंपनियों को तत्काल तेल मिलने से उनकी जरूरतें पूरी करने में मदद मिल सकती है। इससे खुले बाजार से तेल खरीदने का दबाव घट सकता है और कीमतों में तेजी को सीमित करने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, अगर युद्ध और समुद्री मार्गों में बाधाएं लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो केवल आपात भंडार से तेल जारी करना कीमतों में बड़ी गिरावट की गारंटी नहीं देगा।

मार्च में 17.2 करोड़ बैरल तेल देने का किया गया था वादा

अमेरिका की यह पहल मार्च में किए गए एक बड़े अंतरराष्ट्रीय वादे से भी जुड़ी है। उस समय अमेरिका ने अपने रणनीतिक भंडार से 17.2 करोड़ बैरल तेल उपलब्ध कराने का वादा किया था। यह अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के करीब 30 सदस्य देशों की साझा योजना का हिस्सा था।

इस अंतरराष्ट्रीय पहल के तहत विभिन्न देशों के आपातकालीन भंडार से कुल 40 करोड़ बैरल तेल जारी करने का लक्ष्य रखा गया था। इसका मकसद आपूर्ति में आई रुकावटों का असर कम करना और वैश्विक तेल बाजार को स्थिरता देना था।

हालांकि, इस योजना को लागू करने में कुछ मुश्किलें भी सामने आईं। इससे पहले अमेरिका की ओर से की गई एक पेशकश पर कंपनियों की प्रतिक्रिया उम्मीद के मुताबिक नहीं रही थी।

तेल उधार लेने की शर्तों से पीछे हटीं कंपनियां?

रिपोर्ट के मुताबिक, जून में कंपनियों ने अमेरिका के रणनीतिक भंडार से केवल करीब पांच लाख बैरल तेल उधार लेने में दिलचस्पी दिखाई थी। इसकी एक प्रमुख वजह योजना की शर्तें बताई गईं।

कंपनियों को उधार लिए गए तेल के बदले भविष्य में 24 प्रतिशत तक अतिरिक्त कच्चा तेल लौटाना पड़ सकता था। यानी उन्हें जितना तेल मिला, उससे अधिक मात्रा वापस करनी पड़ सकती थी। इस वजह से कंपनियों के लिए यह व्यवस्था कम आकर्षक साबित हुई।

अब अमेरिकी सरकार की नई पेशकश पर नजर रहेगी। यदि कंपनियां इस बार बड़ी मात्रा में तेल लेने के लिए आगे आती हैं, तो बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति पहुंचाने के प्रयास को गति मिल सकती है।

रूसी डीजल की आपूर्ति बढ़ाने की भी तैयारी

अमेरिका की कोशिशें केवल रणनीतिक तेल भंडार तक सीमित नहीं हैं। खबर के मुताबिक, इसी महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच रूसी डीजल के निर्यात की अनुमति को लेकर सहमति बनने की बात सामने आई है। शुरुआती चरण में करीब तीन लाख टन डीजल जारी होने की उम्मीद है।

डीजल की अतिरिक्त आपूर्ति से उन बाजारों को राहत मिल सकती है, जहां इसकी उपलब्धता को लेकर दबाव बना हुआ है। हालांकि, इस कदम को लेकर राजनीतिक विवाद भी है। यूक्रेन और यूरोपीय नेताओं ने रूस को राहत मिलने की आशंका जताते हुए इसकी आलोचना की है। उनका तर्क है कि रूसी तेल उत्पादों के निर्यात में ढील से रूस को आर्थिक फायदा पहुंच सकता है।

इस घटनाक्रम से साफ है कि वैश्विक तेल बाजार को संभालने के प्रयासों में आर्थिक जरूरतों के साथ युद्ध, प्रतिबंध और देशों के राजनीतिक हित भी अहम भूमिका निभा रहे हैं।

जी7 की भी चार महीने में 10 करोड़ बैरल तेल जारी करने की योजना

दुनिया के सात प्रमुख औद्योगिक देशों के समूह जी7 ने भी 2 अक्टूबर को आपात तेल जारी करने की अलग योजना घोषित की थी। इसके तहत चार महीनों के दौरान करीब 10 करोड़ बैरल तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध कराने की योजना है। इस पहल को अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के माध्यम से आगे बढ़ाया जाना है।

इस योजना में डीजल की आपूर्ति बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है, ताकि बाजार में इसकी कमी को दूर करने में मदद मिल सके।

अमेरिका और जी7 की इन पहलों का साझा उद्देश्य बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ाना और मांग तथा आपूर्ति के बीच अंतर को कम करना है। हालांकि, आपात भंडार से तेल जारी करना संकट के समय राहत देने का उपाय है, स्थायी समाधान नहीं। यदि सामान्य आपूर्ति लंबे समय तक बाधित रहती है, तो भंडार से लगातार तेल निकालकर कीमतों को नीचे रखना मुश्किल हो सकता है।

भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर क्या पड़ेगा असर?

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों का भारत पर सीधा असर पड़ सकता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में कच्चा तेल महंगा होने पर देश का आयात खर्च बढ़ता है और तेल कंपनियों की लागत पर दबाव पड़ सकता है।

यदि अमेरिका और अन्य देशों की पहल से बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ती है और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट आती है, तो भारत को भी राहत मिलने की संभावना है। इससे कच्चे तेल के आयात पर होने वाला खर्च कम हो सकता है।

हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भाव घटने का मतलब यह नहीं है कि भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें तुरंत कम हो जाएंगी। घरेलू ईंधन के दाम पर कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय भाव के अलावा रुपये और डॉलर की विनिमय दर, तेल कंपनियों की लागत तथा केंद्र और राज्य सरकारों के करों का भी असर पड़ता है।

भारतीय उपभोक्ताओं को कितनी राहत मिलेगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कितनी गिरती हैं और यह गिरावट कितने समय तक बनी रहती है। यदि आपूर्ति को लेकर चिंताएं बरकरार रहती हैं और कच्चा तेल 106 डॉलर प्रति बैरल के आसपास या उससे ऊपर बना रहता है, तो कीमतों में राहत सीमित रह सकती है।

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