रूस की तकनीक और भारत की ताकत! ब्रह्मोस-2 से बढ़ेगी सैन्य शक्ति, 7,400 किमी/घंटे से ज्यादा हो सकती है रफ्तार
ब्रह्मोस-2 में क्या होगा खास?
ब्रह्मोस-2 परियोजना पर भारत का रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और रूस की एनपीओ मशिनोस्ट्रोयेनिया, ब्रह्मोस एयरोस्पेस के माध्यम से सहयोग कर रहे हैं। रिपोर्ट्स में संभावना जताई गई है कि इस मिसाइल में रूसी स्क्रैमजेट इंजन तकनीक का इस्तेमाल हो सकता है। इसी तरह की तकनीक रूस की जिरकॉन मिसाइल में इस्तेमाल किए जाने की जानकारी दी जाती है।
कुछ अनुमानों के मुताबिक, ब्रह्मोस-2 की रफ्तार 7,408 किलोमीटर प्रति घंटे से भी अधिक हो सकती है। यह मौजूदा ब्रह्मोस की बताई जाने वाली गति से लगभग दोगुनी होगी। हालांकि, यह आंकड़ा फिलहाल संभावित क्षमता का अनुमान है, न कि किसी परीक्षण से प्रमाणित प्रदर्शन।
जहाज, पनडुब्बी और जमीन से दागने की योजना
रिपोर्ट्स के अनुसार, ब्रह्मोस-2 में भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स, दिशा-निर्देशन प्रणाली और लक्ष्य खोजने वाली तकनीक को शामिल करने की संभावना है। इसके जरिए मिसाइल को अलग-अलग सैन्य जरूरतों के अनुरूप विकसित किया जा सकता है।
योजना के तहत इसे युद्धपोतों, पनडुब्बियों और जमीन आधारित प्रणालियों से दागने योग्य बनाने की बात कही जा रही है। कुछ रिपोर्ट्स में इसकी मारक दूरी 1,500 किलोमीटर तक होने का अनुमान भी लगाया गया है। हालांकि, इसकी वास्तविक क्षमता और विभिन्न प्रक्षेपण प्रणालियों के साथ इस्तेमाल को लेकर अभी आधिकारिक विवरण जारी नहीं किए गए हैं।
हाइपरसोनिक गति से दुश्मन को मिलेगा कम समय
हाइपरसोनिक मिसाइलें ध्वनि की गति से कम से कम पांच गुना तेज उड़ान भरने में सक्षम होती हैं। इतनी तेज गति के कारण विरोधी पक्ष को मिसाइल का पता लगाने, उसकी दिशा का आकलन करने और उसे रोकने के लिए कम समय मिल सकता है।
यदि ब्रह्मोस-2 अनुमानित क्षमताओं के साथ विकसित होती है, तो यह भारत की सैन्य ताकत में अहम योगदान दे सकती है। हालांकि, वास्तविक प्रभाव इसकी अंतिम गति, उड़ान क्षमता, लक्ष्य भेदने की सटीकता और परीक्षणों के नतीजों पर निर्भर करेगा।
करीब दो दशक पुरानी परियोजना, फिर भी कई चुनौतियां
ब्रह्मोस-2 की योजना लंबे समय से चल रही है, लेकिन अब तक इसके पहले उड़ान परीक्षण की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। परियोजना के सामने कई चुनौतियां बताई जाती हैं। इनमें विकास की ऊंची लागत, उन्नत तकनीक के हस्तांतरण से जुड़ी दिक्कतें और तीनों सेनाओं की अलग-अलग जरूरतों के अनुसार प्राथमिकताएं तय करना शामिल है।
कुछ अनुमानों में एक ब्रह्मोस-2 मिसाइल की कीमत करीब 1.25 करोड़ डॉलर बताई गई है, जो मौजूदा ब्रह्मोस की अनुमानित लागत से लगभग तीन गुना हो सकती है। हालांकि, इसकी कीमत को लेकर भी कोई आधिकारिक आंकड़ा घोषित नहीं किया गया है।
रूसी तकनीक के हस्तांतरण पर भी नजर
रिपोर्ट्स में कहा गया है कि रूस अत्याधुनिक स्क्रैमजेट तकनीक के पूर्ण हस्तांतरण को लेकर सतर्क रहा है। यदि तकनीक तक पहुंच सीमित रहती है, तो इससे परियोजना की लागत और विकास की गति प्रभावित हो सकती है।
इस बीच, ब्रह्मोस एयरोस्पेस की प्राथमिकताओं में हल्की ब्रह्मोस-एनजी मिसाइल का विकास भी शामिल बताया जाता है। इसे तेजस और मिग-29 जैसे लड़ाकू विमानों के लिए उपयुक्त बनाने की योजना है। कुछ अनुमानों के अनुसार, ब्रह्मोस-2 के उड़ान परीक्षण 2027-28 से पहले शुरू होने की संभावना कम है। यह समयसीमा भी आधिकारिक तौर पर घोषित नहीं की गई है।
ब्रह्मोस के निर्यात से भारत को मिली नई पहचान
भारत और रूस की साझेदारी में विकसित मौजूदा ब्रह्मोस मिसाइल का निर्यात भी भारतीय रक्षा उद्योग के लिए महत्वपूर्ण रहा है। फिलीपींस को इसकी आपूर्ति का समझौता हो चुका है, जबकि वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ ब्रह्मोस को लेकर रुचि और संभावित सहयोग की चर्चा होती रही है।
ब्रह्मोस-2 के सफल विकास से भारत की उन्नत मिसाइल क्षमताओं को आगे बढ़ाने और स्वदेशी तकनीक की भूमिका मजबूत करने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, परियोजना की वास्तविक प्रगति का आकलन आधिकारिक घोषणाओं, परीक्षणों और अंतिम तकनीकी विवरणों के आधार पर ही किया जा सकेगा।
