शिपिंग सेक्टर में हरित क्रांति की तैयारी, 2028 से समुद्री जहाजों के ईंधन में बायोफ्यूल का इस्तेमाल बढ़ेगा

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नई दिल्ली। देश में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने को लेकर बहस के बीच समुद्री परिवहन क्षेत्र में भी स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने की तैयारी शुरू हो गई है। सरकार ने समुद्री जहाजों से होने वाले प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए बायोफ्यूल मिश्रण को बढ़ावा देने वाला एक मसौदा रोडमैप जारी किया है। प्रस्ताव के तहत भारतीय तटीय व्यापार में चलने वाले जहाजों को चरणबद्ध तरीके से बायोफ्यूल मिश्रित समुद्री ईंधन के इस्तेमाल की ओर ले जाया जाएगा।

1 जनवरी 2028 से शुरू होगा चरणबद्ध बदलाव

डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ मरीन एडमिनिस्ट्रेशन की ओर से जारी मसौदे में 1 जनवरी 2028 से भारतीय तटीय व्यापार में लगे जहाजों को एमजीओ, वीएलएसएफओ या एफओ जैसे समुद्री ईंधन के साथ मात्रा के हिसाब से 10 प्रतिशत तक बायोफ्यूल मिश्रण इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करने का प्रस्ताव रखा गया है।

हालांकि, बायोफ्यूल के इस्तेमाल का फैसला उसकी उपलब्धता, जहाज और ईंधन की अनुकूलता, सुरक्षा, इंजन या उपकरण निर्माता की सलाह और लागू कानूनी नियमों को ध्यान में रखकर किया जाएगा।

2029 से कम से कम 10 प्रतिशत बायोफ्यूल जरूरी

मसौदे के मुताबिक 1 जनवरी 2029 से इसके दायरे में आने वाले भारतीय तटीय व्यापार के प्रत्येक जहाज के लिए प्रोपल्शन और सहायक मशीनरी में इस्तेमाल होने वाले समुद्री ईंधन में मात्रा के हिसाब से कम से कम 10 प्रतिशत बायोफ्यूल रखना जरूरी होगा।

सरकार का मानना है कि पारंपरिक समुद्री ईंधन में ड्रॉप-इन बायोफ्यूल मिलाकर इस्तेमाल करने से जहाजों के पूरे जीवनचक्र में होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम किया जा सकता है। इसके लिए मौजूदा जहाजों की ईंधन प्रणाली में बड़े बदलाव की जरूरत भी कम पड़ेगी।

क्या होगा सस्टेनेबल बायोफ्यूल?

DGMA के अनुसार सस्टेनेबल बायोफ्यूल ऐसा ईंधन होगा, जो निर्धारित मानकों वाले कच्चे माल से प्रमाणित और स्वीकृत प्रक्रिया के जरिए तैयार किया गया हो। इसके उत्पादन स्रोत, ट्रेसबिलिटी और पूरे जीवनचक्र में होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से जुड़ी जानकारी का दस्तावेजी प्रमाण भी जरूरी होगा।

इसका उद्देश्य केवल समुद्री ईंधन में जैव ईंधन मिलाना नहीं, बल्कि उसके उत्पादन से लेकर इस्तेमाल तक पर्यावरणीय प्रभाव को नियंत्रित करना है।

किन जहाजों पर लागू होगा प्रस्ताव?

प्रस्तावित व्यवस्था एमजीओ, वीएलएसएफओ और एफओ जैसे पारंपरिक समुद्री ईंधन का इस्तेमाल करने वाले जहाजों पर लागू होगी। इसमें जहाज के आगे बढ़ने वाले तंत्र यानी प्रोपल्शन और सहायक मशीनरी में इस्तेमाल होने वाले संबंधित समुद्री ईंधन ग्रेड भी शामिल होंगे।

यह व्यवस्था भारतीय तटीय व्यापार में लगे जहाजों पर केंद्रित होगी। इसके दायरे में केवल जहाज मालिक ही नहीं, बल्कि शिप मैनेजर, ऑपरेटर, चार्टरर, मास्टर, ईंधन आपूर्तिकर्ता, ईंधन उत्पादक और ब्लेंडर जैसे समुद्री ईंधन की खरीद, मिश्रण, आपूर्ति और इस्तेमाल से जुड़े पक्ष भी आएंगे।

जहाज मालिकों को करनी होगी तैयारी

नई व्यवस्था लागू होने से पहले जहाज मालिकों, संचालकों और चार्टरर्स को बायोफ्यूल मिश्रण की खरीद और उपलब्धता की व्यवस्था करनी होगी। साथ ही जहाजों में ईंधन की अनुकूलता और स्थिरता की जांच, भंडारण और प्रबंधन की तैयारी, चालक दल का प्रशिक्षण तथा ईंधन की खपत और मशीनरी के प्रदर्शन की निगरानी करनी होगी।

इसके अलावा बायोफ्यूल के इस्तेमाल से जुड़े रिकॉर्ड भी व्यवस्थित तरीके से रखने होंगे।

राष्ट्रीय हरित लक्ष्यों के अनुरूप पहल

DGMA के मुताबिक प्रस्तावित व्यवस्था राष्ट्रीय समुद्री डीकार्बोनाइजेशन नीति ढांचे, राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति 2018 और भारत के पर्यावरण संबंधी लक्ष्यों के अनुरूप है। इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने का प्रस्ताव है, ताकि समुद्री क्षेत्र में बायोफ्यूल का इस्तेमाल धीरे-धीरे बढ़ाया जा सके।

इस पहल से भारतीय तटीय परिवहन में पारंपरिक समुद्री ईंधन पर निर्भरता कम करने और जहाजों से होने वाले प्रदूषण को घटाने की दिशा में कदम आगे बढ़ सकता है।

 

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