कलम चली तो पत्रकार निशाने पर? सच की आवाज़ दबाने का ये कैसा खेल!
काली सूची में कलमकार, मगर सवाल जस के तस! LDA साहिब, नाम पर दाग लगाने से सच नहीं मिटेगा!
लखनऊ। किसी भी स्वस्थ और जीवंत लोकतंत्र की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि वहां चुनाव कितने भव्य होते हैं या सरकारी विज्ञापनों में विकास के कितने दावे चमकते हैं। लोकतंत्र की असल कसौटी यह है कि सत्ता के गलियारों से सवाल पूछने वाले चौथे स्तंभ यानी पत्रकारों को कितनी आजादी और सम्मान मिल रहा है। लेकिन उत्तर प्रदेश में आज हालात ऐसे बन चुके हैं कि जब एक पत्रकार मैदान में उतरकर हकीकत सामने लाता है, तो उसे व्यवस्था के सकारात्मक जवाब के बजाय धमकियों और मुकदमों का सामना करना पड़ता है।
हाल ही में पत्रकारों और पुलिस महकमे के बीच हुए गतिरोध ने एक बहुत बड़ा और गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या स्वतंत्र और निष्पक्ष कवरेज अब अपराध बनता जा रहा है? जब अधिकारियों द्वारा पत्रकारों के साथ कथित अभद्र व्यवहार किया गया और एफआईआर दर्ज करने की धमकियां दी गईं, तो कलमकारों ने झुकने के बजाय एकजुट होकर प्रेस कॉन्फ्रेंस का बहिष्कार किया और माइक डाउन करके अपना कड़ा प्रतिरोध दर्ज कराया। लोकतंत्र संवाद से चलता है, धमकी से नहीं। यदि किसी खबर से असहमति है या कोई तथ्य गलत है, तो उसके लिए खंडन और विधिक मार्ग हमेशा खुले रहते हैं। लेकिन, सिर्फ अपनी कमियों को छिपाने के लिए कलम पर ताला जड़ने की कोशिश करना लोकतांत्रिक मर्यादाओं का खुला उल्लंघन है।
पुलिसिया दबाव के साथ-साथ प्रशासनिक महकमों में भी पत्रकारों को दबाने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। लखनऊ विकास प्राधिकरण, एलडीए के उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार द्वारा हाल ही में पत्रकारों की एक तथाकथित फर्जी एवं काली सूची जारी किए जाने का वाकया बेहद निंदनीय और गैर-जिम्मेदाराना है। सरकारें पारदर्शी शासन और प्रेस की स्वतंत्रता के कितने भी दावे कर लें, लेकिन जब प्रशासनिक अधिकारी अपने कुर्सी के अहंकार में पत्रकारों के सम्मान के साथ खिलवाड़ करते हैं, तो वे असल में जनता के हक की आवाज को दबाने की कोशिश कर रहे होते हैं। क्या अब सच लिखने वालों को हतोत्साहित करने के लिए ऐसी अलोकतांत्रिक सूचियां तैयार की जाएंगी?
सिर्फ पुलिस और एलडीए ही नहीं, बल्कि बिजली विभाग, नगर निगम और लोक निर्माण विभाग पीडब्ल्यूडी, जैसे तमाम महत्वपूर्ण विभागों के CUG नंबर अब केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह गए हैं। प्रेस विज्ञापनों में बढ़-चढ़कर दिखने वाले ये नंबर, जब कोई पत्रकार या आम नागरिक अपनी किसी समस्या को लेकर मिलाता है, तो या तो स्विच ऑफ मिलते हैं या साइलेंट कर दिए जाते हैं। सवाल यह है कि जब सरकारी नंबरों का पूरा खर्च जनता के टैक्स से चलता है, तो फिर जनता और मीडिया के प्रति जवाबदेही से इतनी घबराहट क्यों?
अब समय आ गया है कि इस बढ़ती प्रशासनिक अराजकता और तानाशाही रवैये पर लगाम लगाने के लिए राज्य स्तर पर ठोस और निर्णायक कदम उठाए जाएं। कानून की किताब का खौफ दिखाकर बिना ठोस तथ्यों के मनमाने ढंग से धाराएं थोपने का यह चलन अब बंद होना चाहिए। यह लड़ाई सिर्फ किसी एक पत्रकार के सम्मान की नहीं है, बल्कि उस सच की रक्षा की है जिस पर पूरे लोकतंत्र की नींव टिकी हुई है।
प्रदेश के मुख्यमंत्री से यह प्रबल अपेक्षा है कि वे इस पूरे प्रकरण का संज्ञान लें और पत्रकारों की सुरक्षा, उनके सम्मान तथा पेशेवर स्वतंत्रता को कानूनी जामा पहनाने के लिए पत्रकार सुरक्षा कानून जैसी प्रभावी व्यवस्था जल्द से जल्द लागू करें। माइक कुछ देर के लिए म्यूट किए जा सकते हैं, कैमरों की नजरों को कुछ पलों के लिए रोका जा सकता है, लेकिन जनहित और सच्चाई के ये सवाल कभी दबाए नहीं जा सकते। जब तक समाज में सच को देखने और लिखने की जरूरत रहेगी, पत्रकारिता की यह मुखर आवाज और अधिक बुलंदी के साथ गूंजती रहेगी।
लेखक:
मोहम्मद सैफ साबरी
मान्यता प्राप्त पत्रकार
राष्ट्रीय महासचिव, पत्रकार संवाद मंच
