बॉलीवुड की फेवरेट ‘मां’ ही थीं बड़े पर्दे की पहली सुपरहीरो, उड़कर किया एक्शन और सुपरमैन बनकर मचाई थी सनसनी

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मलयालम सिनेमा में महिला-प्रधान सुपरहीरो फिल्मों को नई पहचान दिलाने वाली ‘लोका: चैप्टर 1’ ने हाल के वर्षों में जबरदस्त चर्चा बटोरी है। कल्याणी प्रियदर्शन स्टारर इस फिल्म में एक ऐसी नायिका दिखाई गई, जो अपनी सुपरनैचुरल शक्तियों के दम पर अन्याय और भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोलती है। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी इस फिल्म को भरपूर प्यार मिला, जिससे यह साफ हो गया कि दर्शक अब महिला सुपरहीरो की कहानियों को पूरी गंभीरता और उत्साह के साथ स्वीकार कर रहे हैं। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए अब मैडॉक फिल्म्स की महिला सुपरहीरो फिल्म ‘शक्ति शालिनी’ भी चर्चा में है, जिसमें अनीता पड्डा लीड रोल में नजर आएंगी।

बॉलीवुड में नई नहीं है महिला सुपरहीरो की कहानी
हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि हिंदी सिनेमा में महिला सुपरहीरो की अवधारणा कोई नई सोच नहीं है। दशकों पहले, जब न तो CGI का जमाना था और न ही केप पहनने वाले मॉडर्न सुपरहीरो पर्दे पर छाए थे, तब बॉलीवुड अपनी पहली महिला सुपरहीरो को दर्शकों के सामने पेश कर चुका था। यह सुपरहीरो कोई और नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा की सदाबहार ‘मां’ कही जाने वाली निरूपा रॉय थीं।

जब निरूपा रॉय बनीं बॉलीवुड की पहली महिला सुपरमैन
अमिताभ बच्चन की फिल्मों में भावुक मां बनने और ‘जय संतोषी मां’ में देवी स्वरूप से पहले, निरूपा रॉय ने 1960 में आई फिल्म ‘सुपरमैन’ में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी। इस फिल्म का निर्देशन मोहम्मद हुसैन और अनंत ठाकुर ने किया था। फिल्म में जयराज, हेलेन और टुनटुन जैसे कलाकार भी अहम भूमिकाओं में नजर आए थे। इसी फिल्म में निरूपा रॉय ने सुपरमैन का किरदार निभाकर बॉलीवुड की पहली महिला सुपरहीरो बनने का रिकॉर्ड अपने नाम किया।

हॉलीवुड से पहले भारत में दिखी महिला सुपरहीरो
जहां हॉलीवुड में पहली फीचर-लेंथ सुपरमैन फिल्म ‘सुपरमैन एंड द मोल मैन’ 1951 में आई और 1978 में क्रिस्टोफर रीव की ‘सुपरमैन’ ने दुनियाभर में लोकप्रियता हासिल की, वहीं हिंदी सिनेमा इससे कहीं पहले अपनी महिला सुपरमैन को पर्दे पर उतार चुका था। यह उस दौर की सोच से कहीं आगे की कल्पना मानी जाती है।

उड़ने और अमर होने की ताकत से लड़ी बुराई से जंग
फिल्म ‘सुपरमैन’ में निरूपा रॉय ने शांति नाम की नायिका का किरदार निभाया था, जो एक वैज्ञानिक की गोद ली हुई बेटी होती है। वैज्ञानिक द्वारा तैयार किए गए एक विशेष सीरम के जरिए शांति को उड़ने और अविनाशी बनने की शक्तियां मिलती हैं। इन ताकतों के सहारे वह एक खतरनाक डाकू का अंत करती है, जो इलाके में आतंक का पर्याय बना हुआ था। यह फिल्म न किसी स्पैन्डेक्स सूट पर निर्भर थी और न ही हाई-टेक विजुअल इफेक्ट्स पर, बल्कि इसकी ताकत इसकी कहानी और किरदारों में थी।

महिला सशक्तिकरण का दशकों पुराना उदाहरण
आज महिला सशक्तिकरण और महिला सुपरहीरो फिल्मों को एक नए ट्रेंड के रूप में देखा जाता है, लेकिन निरूपा रॉय की ‘सुपरमैन’ यह साबित करती है कि यह सोच बॉलीवुड में बहुत पहले से मौजूद थी। निरूपा रॉय सिर्फ त्याग और ममता की प्रतीक नहीं थीं, बल्कि वह एक्शन और साहस से भरपूर किरदार निभाने में भी पूरी तरह सक्षम थीं।

टाइपकास्टिंग में खो गया सुपरहीरो का इतिहास
दुर्भाग्य की बात यह रही कि बाद के वर्षों में इंडस्ट्री ने निरूपा रॉय को रोने-धोने वाली मां के किरदारों तक सीमित कर दिया। उनकी शुरुआती बोल्ड और एक्शन-प्रधान फिल्मों का जिक्र धीरे-धीरे पीछे छूट गया। बहुत कम दर्शकों को यह पता है कि वही अभिनेत्री कभी आसमान में उड़कर अपराधियों से लड़ चुकी थीं और बड़े पर्दे पर दुनिया बचा चुकी थीं।

 

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