हिटलर को लेकर क्यों पछताता रहा ब्रिटिश सैनिक हेनरी टैंडी? युद्ध की उस रहस्यमयी घटना ने इतिहास को दिया नया मोड़

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प्रथम विश्व युद्ध से जुड़ी कई कहानियां आज भी इतिहास के पन्नों में रहस्य और चर्चा का विषय बनी हुई हैं। ऐसी ही एक कहानी ब्रिटिश सैनिक हेनरी टैंडी से जुड़ी है, जिन्हें उनकी बहादुरी के लिए विक्टोरिया क्रॉस, मिलिट्री मेडल और डिस्टिंग्विश्ड कंडक्ट मेडल जैसे प्रतिष्ठित सम्मान मिले थे। लेकिन उनकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ भी आया, जिसने उन्हें लंबे समय तक पछतावे में डुबो दिया।

28 सितंबर 1918 का वह दिन, जब बदल गया इतिहास का किस्सा

कहा जाता है कि 28 सितंबर 1918 को फ्रांस के मार्कोइंग क्षेत्र में लड़ाई के दौरान हेनरी टैंडी ने एक घायल जर्मन सैनिक को देखा था। वह सैनिक निहत्था था और बुरी तरह घायल होकर पीछे हट रहा था। टैंडी ने उस पर निशाना साधा, लेकिन गोली नहीं चलाई और उसे जाने दिया। बाद में यह दावा किया गया कि वह घायल सैनिक कोई और नहीं बल्कि एडोल्फ हिटलर था, जो आगे चलकर जर्मनी का तानाशाह बना।

पेंटिंग और मुलाकातों से जुड़ी कहानी ने बढ़ाई रहस्य गाथा

इस कहानी को और बल तब मिला जब 1923 में एक पेंटिंग में ब्रिटिश सैनिक द्वारा घायल साथी की मदद करते हुए दृश्य को दर्शाया गया। बाद में कहा गया कि यह टैंडी से जुड़ा है। वर्ष 1938 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री नेविल चेम्बरलेन की हिटलर से मुलाकात के दौरान भी हिटलर ने कथित तौर पर इस घटना का जिक्र किया और ब्रिटिश सैनिक के प्रति आभार जताने की बात कही। इसी से यह धारणा और मजबूत हो गई कि टैंडी ने ही हिटलर की जान बख्शी थी।

इतिहासकारों ने कहानी पर उठाए सवाल

हालांकि कई इतिहासकार इस पूरे किस्से को एक मिथक मानते हैं। जर्मन सैन्य रिकॉर्ड के अनुसार, जिस दिन की यह घटना बताई जाती है, उस समय हिटलर उस इलाके में मौजूद ही नहीं था। कुछ दस्तावेज यह भी बताते हैं कि पेंटिंग भी 1914 की घटना पर आधारित थी, न कि 1918 की।

टैंडी का खुद का बयान भी रहा अस्पष्ट

हेनरी टैंडी ने खुद इस घटना की पूरी पुष्टि कभी नहीं की। 1939 में उन्होंने कहा था कि उन्हें ठीक से याद नहीं कि उन्होंने हिटलर को देखा था या नहीं। हालांकि 1940 में कोवेंट्री पर हुए हमले के बाद उन्होंने यह जरूर कहा था कि अगर उन्हें पता होता कि वह सैनिक आगे चलकर इतना विनाशकारी साबित होगा, तो शायद वह गोली चला देते।

एक रहस्य जो इतिहास में आज भी जिंदा है

यह कहानी आज भी इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है कि क्या वाकई टैंडी ने हिटलर की जान बख्शी थी या यह सिर्फ एक ऐतिहासिक किंवदंती है, जिसने समय के साथ एक रहस्यमयी रूप ले लिया।

 

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