दहेज मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: शिकायत में दहेज देने की बात मानना पत्नी या उसके परिवार के खिलाफ केस का आधार नहीं

untitled-design-2026-04-18t130605-1776497778

नई दिल्ली: दहेज से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण और स्पष्ट संदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि कोई महिला अपनी शिकायत में दहेज दिए जाने की बात स्वीकार करती है, तो केवल इसी आधार पर उसके या उसके परिवार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती। अदालत ने जोर देकर कहा कि ऐसे मामलों में पीड़ित पक्ष को कानूनी संरक्षण देना बेहद जरूरी है, ताकि वे बिना भय के अपनी बात रख सकें।

पति की याचिका को कोर्ट ने किया खारिज

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। दरअसल, एक पति ने अदालत से मांग की थी कि उसकी पत्नी और उसके परिवार के खिलाफ दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 के तहत एफआईआर दर्ज की जाए। पति का तर्क था कि पत्नी ने अपनी शिकायत में दहेज देने की बात स्वीकार की है, जो अपराध की श्रेणी में आता है। हालांकि, अदालत ने इस याचिका को खारिज कर दिया।

पीड़ित पक्ष को मिलना चाहिए कानूनी संरक्षण

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दहेज निषेध अधिनियम की धारा 7(3) पीड़ितों को सुरक्षा प्रदान करती है। अदालत ने कहा कि यदि कोई महिला अपनी शिकायत में दहेज देने की बात बताती है, तो इसे उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल स्वतंत्र और ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही इस तरह के मामलों में कार्रवाई संभव है।

कानून का उद्देश्य पीड़ित को न्याय दिलाना, न कि आरोपी बनाना

अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि दहेज निषेध कानून का मूल उद्देश्य पीड़ितों को न्याय दिलाना है, न कि उन्हें ही अपराधी बना देना। वर्ष 1982 में किए गए संशोधनों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि कई बार सामाजिक दबाव के कारण दहेज दिया जाता है, इसलिए ऐसे मामलों में दहेज देने वालों को अपराधी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

क्या है पूरा मामला

इस मामले की शुरुआत तब हुई जब पत्नी ने अपने पति और ससुराल पक्ष के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। शिकायत में भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए और दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3 के तहत आरोप लगाए गए थे। इसके जवाब में पति ने पत्नी और उसके परिवार के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, जिसमें उसने दहेज देने के अपराध का आरोप लगाया। पति का कहना था कि उसने और उसके परिवार ने दहेज नहीं लिया, लेकिन पत्नी द्वारा दहेज देने का उल्लेख करना अपराध की स्वीकारोक्ति है, इसलिए उनके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक यह मामला पहुंचा, जहां अंततः शीर्ष अदालत ने पति की याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए।

 

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया Samayik Sahara के Facebook पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें...

एक नज़र