नफरती भाषण पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: मौजूदा आपराधिक कानून पर्याप्त, नए निर्देश जारी करने से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने नफरती भाषण के मुद्दे पर अहम टिप्पणी करते हुए साफ कर दिया है कि इससे निपटने के लिए वर्तमान आपराधिक कानून पर्याप्त हैं और इस मामले में न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। बुधवार को सुनाए गए फैसले में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह कहना गलत है कि नफरत फैलाने वाले भाषणों से निपटने के लिए देश में कोई कानून मौजूद नहीं है।
मौजूदा कानूनों को बताया पर्याप्त
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने नफरती भाषण से जुड़ी विभिन्न याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए कहा कि मौजूदा आपराधिक कानून इस तरह के मामलों से निपटने में सक्षम हैं। पीठ ने अपने निर्णय में इस धारणा को खारिज कर दिया कि नफरत फैलाने वाले भाषणों के खिलाफ कोई प्रभावी कानूनी व्यवस्था नहीं है।
कानून में बदलाव का अधिकार विधायिका के पास
अदालत ने यह भी कहा कि बदलती सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए नए कानून बनाना या पुराने कानूनों में संशोधन करना केंद्र सरकार और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। पीठ ने संकेत दिया कि यदि आवश्यक समझा जाए तो विधि आयोग की मार्च 2017 की 267वीं रिपोर्ट में दिए गए सुझावों पर भी विचार किया जा सकता है।
भाईचारे और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा मुद्दा
फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि नफरत फैलाने वाले भाषण और अफवाहों का मुद्दा सीधे तौर पर समाज में भाईचारा, गरिमा और संवैधानिक व्यवस्था के संरक्षण से जुड़ा हुआ है। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगे गए विशेष निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया।
न्यायपालिका कानून नहीं बना सकती
पीठ ने अपने आदेश में दोहराया कि अपराध की परिभाषा तय करना और दंड निर्धारित करना विधायिका का विशेषाधिकार है। अदालत ने कहा कि संविधान के तहत न्यायपालिका कानून नहीं बना सकती और न ही अपने आदेशों के जरिए अपराधों की परिभाषा का विस्तार कर सकती है। संवैधानिक अदालतें केवल कानून की व्याख्या कर सकती हैं और मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए निर्देश जारी कर सकती हैं।

कानूनी कार्रवाई के पर्याप्त प्रावधान मौजूद
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौजूदा आपराधिक ढांचा, जिसमें पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता और अन्य संबंधित कानून शामिल हैं, शत्रुता फैलाने, धार्मिक भावनाओं को आहत करने और सार्वजनिक शांति भंग करने जैसे कृत्यों से निपटने के लिए पर्याप्त है। इसके अलावा, दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के तहत भी कानूनी कार्रवाई शुरू करने के लिए पूरा वैधानिक ढांचा उपलब्ध है।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी संज्ञेय अपराध की जानकारी मिलने पर प्राथमिकी दर्ज करना पुलिस की अनिवार्य जिम्मेदारी है। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो कानून में इसके लिए प्रभावी उपाय भी मौजूद हैं। उल्लेखनीय है कि अदालत ने 20 जनवरी को इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था और अब विस्तृत आदेश की प्रतीक्षा की जा रही है।
