भारतीय मूल की नवी पिल्लई को मिला नोबेल शांति पुरस्कार, बंधुआ मजदूर बनकर दक्षिण अफ्रीका पहुंचे थे दादा
डरबन में हुआ जन्म, तमिल परिवार से जुड़ी हैं नवी पिल्लई
नवी पिल्लई का जन्म दक्षिण अफ्रीका के डरबन में एक प्रवासी तमिल हिंदू परिवार में हुआ था। उनके पिता नारायणसामी बस चालक थे, जबकि उनकी मां शांतमा नायडू ने उन्हें पारंपरिक मूल्यों के साथ पाला। भारतीय विरासत से जुड़ी नवी पिल्लई ने रंगभेद के कठिन दौर में अपनी पहचान बनाई और दक्षिण अफ्रीका में वकालत के क्षेत्र में उल्लेखनीय स्थान हासिल किया।
रंगभेद के दौर से अंतरराष्ट्रीय न्याय तक का सफर
नवी पिल्लई का जीवन दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ संघर्ष और समान अधिकारों की लड़ाई से जुड़ा रहा है। उन्होंने मानवाधिकारों की रक्षा और कानून के शासन को मजबूत करने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम किया। न्याय और मानव गरिमा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई।
अंतरराष्ट्रीय कानून और शांति के लिए योगदान
नवी पिल्लई के काम को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध और संघर्ष जारी हैं। अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था और कानून से जुड़ी संस्थाओं पर भी राजनीतिक दबाव की चुनौतियां सामने आती रही हैं। ऐसे हालात में अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान और शांतिपूर्ण तरीके से विवादों का समाधान करने की जरूरत पर जोर दिया जाता है।
शांति पुरस्कार के लिए मिले थे 287 नामांकन
वर्ष 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए कुल 287 उम्मीदवारों के नामांकन मिलने की जानकारी दी गई है। इनमें एक चौथाई से कुछ अधिक नाम संस्थाओं के थे। इस पुरस्कार के लिए राष्ट्राध्यक्ष, राष्ट्रीय स्तर के राजनेता, विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर, विदेश नीति संस्थानों के प्रमुख, पूर्व नोबेल पुरस्कार विजेता और नोबेल समिति के सदस्य सहित निर्धारित श्रेणियों के लोग नामांकन कर सकते हैं।
बताया गया है कि पुरस्कार मिलने की सूचना देने के लिए समिति नवी पिल्लई से संपर्क नहीं कर पाई थी।
1901 में हुई थी नोबेल शांति पुरस्कार की शुरुआत
नोबेल शांति पुरस्कार की शुरुआत वर्ष 1901 में हुई थी। अब तक यह सम्मान 112 व्यक्तियों और 28 संस्थाओं को दिया जा चुका है। रेड क्रॉस को तीन बार और संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी को दो बार यह पुरस्कार मिल चुका है। वहीं, 19 बार ऐसा भी हुआ है, जब नोबेल शांति पुरस्कार नहीं दिया गया। इनमें से अधिकतर अवसर दोनों विश्व युद्धों के दौरान आए थे।
महात्मा गांधी को भी नहीं मिला था यह सम्मान
महात्मा गांधी को 12 बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था, लेकिन उन्हें कभी यह सम्मान नहीं मिला। वर्ष 1948 में उनकी हत्या के बाद भी नोबेल शांति पुरस्कार किसी को नहीं दिया गया था। यह घटना पुरस्कार के इतिहास के सबसे चर्चित प्रसंगों में गिनी जाती है। वर्ष 2026 के पुरस्कार के तहत 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोना की राशि निर्धारित बताई गई है, जो लगभग 12 लाख अमेरिकी डॉलर के बराबर है।
