यूपी 2027 की सियासत गरम: कांशीराम जयंती से पहले लखनऊ में राहुल गांधी का बड़ा इवेंट, दलित वोट बैंक पर कांग्रेस-सपा की नजर

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लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक हलचल तेज होती नजर आ रही है। राजधानी लखनऊ में शुक्रवार को एक बड़ा राजनीतिक कार्यक्रम होने जा रहा है, जिसमें कांग्रेस नेता राहुल गांधी करीब चार हजार लोगों से सीधे संवाद करेंगे। यह कार्यक्रम इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि यह कांशीराम जयंती से ठीक दो दिन पहले आयोजित हो रहा है और पहली बार राहुल गांधी इस अवसर के आसपास लखनऊ में इतना बड़ा आयोजन कर रहे हैं।

इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में होगा कार्यक्रम

कांग्रेस की प्रदेश इकाई ने कार्यक्रम की तैयारियां पूरी कर ली हैं। यह आयोजन गोमतीनगर स्थित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में किया जाएगा। इसमें पार्टी के एससी-एसटी और ओबीसी प्रकोष्ठ के पदाधिकारी और कार्यकर्ता शामिल होंगे। हालांकि कार्यक्रम में आम जनता को सीधे आमंत्रित नहीं किया गया है। राजनीतिक जानकार इसे दलित वोटरों के बीच कांग्रेस की सक्रियता बढ़ाने की रणनीति के तौर पर देख रहे हैं।

सपा भी मैदान में, PDA दिवस मनाएगी पार्टी

कांग्रेस की सक्रियता के बीच समाजवादी पार्टी भी अपनी रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी ने कांशीराम जयंती को पीडीए दिवस के रूप में मनाने का ऐलान किया है। इसके तहत 15 मार्च को प्रदेश के सभी 75 जिलों में जिला मुख्यालयों पर कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। ऐसे में दलित वोट बैंक को लेकर सियासी दलों के बीच मुकाबला और तेज होता दिखाई दे रहा है।

क्या 2027 में भी बनेगा महागठबंधन का समीकरण?

राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि क्या 2024 के लोकसभा चुनाव की तरह 2027 के विधानसभा चुनाव में भी दलित वोटर महागठबंधन का समर्थन करेंगे, या फिर बहुजन समाज पार्टी की वापसी से समीकरण बदल सकते हैं। यही सवाल आने वाले चुनावी समीकरणों के लिए अहम माना जा रहा है।

यूपी में दलित वोटर की निर्णायक भूमिका

उत्तर प्रदेश में दलित मतदाताओं की संख्या काफी अहम मानी जाती है। प्रदेश में कुल मतदाताओं का लगभग 21 प्रतिशत हिस्सा दलित समुदाय से आता है। राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं, जबकि करीब 40 से 50 सीटें ऐसी हैं जहां दलित वोटरों की हिस्सेदारी 20 से 30 प्रतिशत तक है। इस लिहाज से लगभग 130 सीटों पर दलित मतदाता चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं।

पिछले चुनावों के आंकड़े क्या कहते हैं

2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने 84 आरक्षित सीटों में से 63 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि समाजवादी पार्टी को 20 सीटें मिली थीं। वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने प्रदेश की 17 आरक्षित सीटों में से 8 सीटें जीतकर भाजपा को कड़ी टक्कर दी थी।

दलित वोट बैंक में बदलाव के संकेत

हाल के चुनावी रुझानों में यह भी देखा गया है कि जाटव समुदाय अब भी बहुजन समाज पार्टी का कोर वोटर माना जाता है। वहीं पासवान, धोबी, कोरी और वाल्मीकि समुदाय के कुछ वर्गों का झुकाव धीरे-धीरे भाजपा की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में दलित वोट बैंक की भूमिका बेहद अहम और निर्णायक रहने वाली है।

 

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