महिलाओं के लिए जरूरी हैं ये 5 हेल्थ स्क्रीनिंग टेस्ट, समय रहते मिल सकता है गंभीर बीमारियों का संकेत
नई दिल्ली: महिलाओं का स्वास्थ्य कई जैविक, हार्मोनल और जीवनशैली से जुड़े कारकों से प्रभावित होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं में कुछ बीमारियों का जोखिम अधिक होता है। ऐसे में नियमित स्वास्थ्य जांच न केवल संभावित बीमारियों का समय रहते पता लगाने में मदद करती है, बल्कि गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं से बचाव का भी अवसर देती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, शरीर कई बार बीमारी के शुरुआती संकेत देता है, लेकिन अक्सर महिलाएं दैनिक जिम्मेदारियों के बीच इन संकेतों को नजरअंदाज कर देती हैं। यही वजह है कि समय-समय पर जरूरी मेडिकल और जेनेटिक जांच कराना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
कैंसर स्क्रीनिंग से मिल सकती है शुरुआती चेतावनी
महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर सबसे गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक माना जाता है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में 15 वर्ष से अधिक आयु की करोड़ों महिलाएं इस बीमारी के जोखिम के दायरे में आती हैं। हर साल बड़ी संख्या में नए मामलों की पहचान होती है और कई महिलाओं की मौत भी इस बीमारी के कारण हो जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सर्वाइकल कैंसर के अधिकांश मामलों का संबंध एचपीवी संक्रमण से होता है। इसलिए कम उम्र से ही स्क्रीनिंग और टीकाकरण को महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके अलावा स्तन कैंसर और ओवेरियन कैंसर के जोखिम का आकलन करने के लिए बीआरसीए1 और बीआरसीए2 जीन से जुड़ी जेनेटिक जांच भी उपयोगी साबित हो सकती है।
जेनेटिक डिजीज कैरियर स्क्रीनिंग से पता चल सकता है आनुवंशिक जोखिम
18 से 40 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं के लिए कैरियर स्क्रीनिंग महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस जांच के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि किसी महिला में ऐसी आनुवंशिक स्थितियां मौजूद हैं या नहीं, जो आगे चलकर बच्चों तक पहुंच सकती हैं।
यह जांच डुशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, हेमोफिलिया, सिस्टिक फाइब्रोसिस, थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया जैसी आनुवंशिक बीमारियों के जोखिम का आकलन करने में मददगार मानी जाती है।
गर्भधारण से पहले प्री-इंप्लांटेशन जेनेटिक स्क्रीनिंग का महत्व
आईवीएफ तकनीक के बढ़ते उपयोग के बीच प्री-इंप्लांटेशन जेनेटिक टेस्टिंग को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस प्रक्रिया में आईवीएफ के जरिए तैयार किए गए भ्रूण की जांच गर्भाशय में प्रत्यारोपण से पहले की जाती है।
इस जांच का उद्देश्य भ्रूण में मौजूद संभावित आनुवंशिक बीमारियों की पहचान करना होता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इससे भविष्य में बच्चों में जेनेटिक रोगों के जोखिम को कम करने के साथ-साथ सफल गर्भधारण की संभावना भी बढ़ सकती है।
आरएचडी स्क्रीनिंग गर्भावस्था में हो सकती है फायदेमंद
गर्भवती महिलाओं के लिए आरएचडी स्क्रीनिंग एक महत्वपूर्ण जांच मानी जाती है। इस टेस्ट के जरिए मां और भ्रूण के आरएच फैक्टर की स्थिति का पता लगाया जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, गर्भावस्था की शुरुआत में आरएचडी-नेगेटिव महिलाओं की पहचान होने पर समय रहते आवश्यक चिकित्सकीय उपाय किए जा सकते हैं। इससे गर्भावस्था के दौरान होने वाली जटिलताओं और गर्भपात के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।
जेनेटिक स्क्रीनिंग से पहले ही मिल सकता है बीमारी का संकेत
आधुनिक चिकित्सा में जेनेटिक स्क्रीनिंग को भविष्य की बीमारियों का जोखिम जानने का एक प्रभावी माध्यम माना जा रहा है। यह जांच कई बार बीमारी के लक्षण सामने आने से पहले ही संभावित खतरे की जानकारी दे सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, कोरोनरी आर्टरी रोग, पार्किंसंस, अल्जाइमर, आनुवंशिक कैंसर और मोटापे जैसी कई स्थितियों के जोखिम का आकलन इस जांच के माध्यम से किया जा सकता है।
डॉक्टर की सलाह के बाद ही कराएं जांच
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सभी स्क्रीनिंग और जांचें व्यक्ति की उम्र, पारिवारिक स्वास्थ्य इतिहास और स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर तय की जानी चाहिए। इसलिए किसी भी जांच को करवाने से पहले चिकित्सकीय परामर्श लेना आवश्यक है। समय पर की गई जांच न केवल गंभीर बीमारियों की पहचान में मदद करती है, बल्कि बेहतर उपचार और स्वस्थ जीवन की संभावना भी बढ़ाती है।
