सरकारी नौकरी से बर्खास्तगी मृत्युदंड से कम नहीं! सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, बिना सबूत दोषी ठहराने पर डिप्टी रजिस्ट्रार की बहाली बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की खंडपीठ का फैसला पलटा
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति चंद्रशेखर की पीठ ने मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ के आदेश को रद्द कर दिया। खंडपीठ ने पहले एकल न्यायाधीश के उस फैसले को पलट दिया था, जिसमें आर. सरवणन को सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने एकल न्यायाधीश के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि विश्वविद्यालय की ओर से गठित एक सदस्यीय आयोग की जांच रिपोर्ट से स्पष्ट होता है कि सरवणन को बिना किसी ठोस सबूत के दोषी ठहराया गया था।
सुनी-सुनाई बातों के आधार पर सजा देना गंभीर अन्याय
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उसके साथ गंभीर अन्याय है। पीठ ने टिप्पणी की कि महज ऐसी बातों के आधार पर किसी व्यक्ति को फांसी पर लटका देने से बड़ा अन्याय क्या हो सकता है।
अदालत के मुताबिक, मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने किसी ठोस और उचित कारण के बिना एकल न्यायाधीश के फैसले में हस्तक्षेप किया था। शीर्ष अदालत ने 16 अक्टूबर को पारित आदेश में भी स्पष्ट किया कि सेवा से बर्खास्तगी या हटाने का दंड कर्मचारी और उसके परिवार पर दूरगामी प्रभाव डालता है।
नौकरी छिनने से आर्थिक रूप से असहाय हो सकता है कर्मचारी
पीठ ने कहा कि नौकरी से बर्खास्त होने पर सरकारी कर्मचारी उन सेवा संबंधी लाभों से वंचित हो जाता है, जिन्हें उसने अपने कार्यकाल के दौरान अर्जित किया होता है। इससे उसकी आर्थिक स्थिति बिगड़ सकती है और वह असहाय स्थिति में पहुंच सकता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी दंड के परिणाम इतने गंभीर हों, तो रिट अदालत मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकती। उपयुक्त मामलों में अदालत को दंडात्मक आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करनी चाहिए और न्याय तथा निष्पक्षता की जरूरत होने पर मामले की समीक्षा करनी चाहिए।
वैकल्पिक उपाय होने पर भी हाईकोर्ट कर सकता है सुनवाई
विश्वविद्यालय ने दलील दी थी कि एकल न्यायाधीश को रिट क्षेत्राधिकार के तहत मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए थी, क्योंकि कर्मचारी के पास तमिलनाडु सेवा नियमों के तहत वैकल्पिक उपाय उपलब्ध था। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया।
पीठ ने कहा कि रिट अदालत की शक्तियों पर कुछ स्व-निर्धारित सीमाओं के अलावा ऐसा कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, जो उसे उचित मामलों में हस्तक्षेप करने से रोक सके। अदालत ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्याय, निष्पक्षता और विवेक को बढ़ावा देने के लिए अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल कर सकता है।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ बर्खास्तगी जैसी कठोर कार्रवाई करते समय ठोस साक्ष्य और न्यायसंगत प्रक्रिया जरूरी है। यदि किसी कर्मचारी को पर्याप्त सबूत के बिना दोषी ठहराया जाता है, तो परिस्थितियों के अनुसार अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।
