64 प्रकाशवर्ष दूर ‘दूसरी दुनिया’ से पहली बार पकड़ी गई रेडियो आवाज, वैज्ञानिकों ने सीधे देख लिया बाहरी ग्रह का शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र

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नई दिल्ली: अंतरिक्ष में पृथ्वी से करीब 64 प्रकाशवर्ष दूर मौजूद विशाल गैस ग्रह बीटा पिक्टोरिस बी से पहली बार रेडियो संकेत सीधे पकड़े गए हैं। वैज्ञानिकों ने इन संकेतों का स्रोत उसके मूल तारे के बजाय खुद ग्रह को पाया है। इस खोज की खास बात यह है कि रेडियो तरंगों के जरिए न सिर्फ इस दूरस्थ ग्रह की मौजूदगी को एक नए तरीके से दर्ज किया गया, बल्कि उसके शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र की भी पहली प्रत्यक्ष झलक मिली है। हालांकि, ये संकेत किसी एलियन सभ्यता का संदेश नहीं हैं, बल्कि ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र से जुड़ी प्राकृतिक ऑरोरा प्रक्रिया का परिणाम हैं।

इस शोध का नेतृत्व केविन एन. ऑर्टिज सेबालोस के नेतृत्व वाली टीम ने किया है। इसके निष्कर्ष आर्काइव पर प्रकाशित शोध-पत्र में सामने आए हैं। हमारे सौर मंडल के बाहर दूसरे तारों की परिक्रमा करने वाले ग्रहों को बाहरी ग्रह या एक्सोप्लैनेट कहा जाता है। 1990 के दशक में इनकी खोज शुरू होने के बाद से वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इन दूरस्थ दुनियाओं का वातावरण, आंतरिक संरचना और चुंबकीय क्षेत्र कैसा होता है।

मीरकैट रेडियो टेलीस्कोप से मिले बेहद कमजोर संकेत

वैज्ञानिकों ने दक्षिण अफ्रीका स्थित मीरकैट रेडियो दूरबीन की मदद से बीटा पिक्टोरिस ग्रह प्रणाली का अध्ययन किया। इस दौरान उन्हें बेहद कमजोर लेकिन बार-बार दोहराए जाने वाले रेडियो संकेत मिले। शुरुआती दौर में यह स्पष्ट नहीं था कि ये संकेत ग्रह से आ रहे हैं या उसके मूल तारे से।

इसकी पुष्टि के लिए शोधकर्ताओं ने रेडियो तस्वीरों में दिखाई देने वाले स्रोतों की स्थिति को बेहद दूर स्थित क्वासरों के सापेक्ष निर्धारित किया। क्वासर खगोलीय माप के लिए स्थिर संदर्भ बिंदु के तौर पर काम कर सकते हैं।

इसके बाद वैज्ञानिकों ने तारे और ग्रह की सटीक स्थिति के साथ रेडियो संकेतों का मिलान किया। संकेत का स्थान बीटा पिक्टोरिस तारे के बजाय उसके ग्रह बीटा पिक्टोरिस बी की स्थिति से मेल खाता मिला। इसी आधार पर शोधकर्ताओं ने रेडियो उत्सर्जन को सीधे ग्रह से जोड़ने का निष्कर्ष निकाला।

एलियन का संदेश नहीं, प्राकृतिक ऑरोरा से निकले संकेत

वैज्ञानिकों के मुताबिक, इन रेडियो संकेतों के पीछे कोई कृत्रिम संदेश नहीं है। यह एक प्राकृतिक खगोलीय प्रक्रिया है, जो ग्रह के शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र से जुड़ी हुई है।

जब उच्च ऊर्जा वाले आवेशित कण ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र की रेखाओं के साथ गति करते हैं और ऊपरी वायुमंडल से टकराते या उसके साथ परस्पर क्रिया करते हैं, तो ऊर्जा का उत्सर्जन होता है। इसी प्रक्रिया से ध्रुवीय ज्योति यानी ऑरोरा पैदा होती है।

पृथ्वी पर भी ऐसी प्रक्रिया देखने को मिलती है। उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्रों में दिखाई देने वाली उत्तरी रोशनी इसका प्रमुख उदाहरण है। बीटा पिक्टोरिस बी के मामले में भी इसी तरह की ऑरोरल गतिविधि से रेडियो तरंगें पैदा होने के प्रमाण मिले हैं।

बृहस्पति से भी ज्यादा ताकतवर चुंबकीय क्षेत्र

इस खोज का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बीटा पिक्टोरिस बी के चुंबकीय क्षेत्र से जुड़ा है। वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि जिस क्षेत्र से रेडियो तरंगें पैदा हो रही हैं, वहां ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र की ताकत कम से कम 1,250 गॉस है।

यह ताकत बृहस्पति के चुंबकीय क्षेत्र की तुलना में काफी अधिक है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह किसी बाहरी ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र की ताकत का पहला प्रत्यक्ष मापन है। इससे पहले एक्सोप्लैनेट के चुंबकीय क्षेत्रों को समझने के लिए वैज्ञानिक मुख्य रूप से सैद्धांतिक मॉडल और अप्रत्यक्ष संकेतों पर निर्भर रहे हैं।

अब रेडियो उत्सर्जन के जरिए इन दूरस्थ ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्रों का प्रत्यक्ष अध्ययन करने का रास्ता खुल सकता है।

युवा गैस दानव ग्रह से मिली अहम जानकारी

बीटा पिक्टोरिस बी एक विशाल गैस दानव ग्रह है और अपेक्षाकृत युवा ग्रह प्रणाली का हिस्सा है। युवा और विशाल ग्रहों के भीतर निर्माण के समय बची ऊर्जा और तीव्र आंतरिक गतिविधियां शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र पैदा कर सकती हैं।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस ग्रह से मिले रेडियो संकेतों के आधार पर सामने आई चुंबकीय क्षेत्र की ताकत युवा और विशाल ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्र को लेकर की गई सैद्धांतिक भविष्यवाणियों के अनुरूप है। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि ऐसे ग्रहों के भीतर चुंबकीय क्षेत्र कैसे बनते हैं और उनके निर्माण व विकास में उनकी क्या भूमिका होती है।

रेडियो खगोल विज्ञान से खुलेंगे एक्सोप्लैनेट के नए राज

अब तक बाहरी ग्रहों के अध्ययन के लिए वैज्ञानिक मुख्य रूप से उनके तारों की रोशनी में होने वाले बदलाव, ग्रह की कक्षीय गति और उसके वातावरण से जुड़े संकेतों का इस्तेमाल करते रहे हैं। रेडियो खगोल विज्ञान इस अध्ययन में एक नया आयाम जोड़ सकता है।

अगर दूसरे विशाल बाहरी ग्रहों से भी इसी तरह के रेडियो संकेत दर्ज किए जा सके, तो वैज्ञानिक अलग-अलग ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्रों की तुलना कर पाएंगे। इससे ग्रहों की आंतरिक संरचना, निर्माण और विकास को समझने में मदद मिल सकती है।

ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र उसके आसपास के अंतरिक्षीय वातावरण के साथ होने वाली उसकी बातचीत को भी प्रभावित करता है। इसलिए रेडियो उत्सर्जन का अध्ययन केवल चुंबकीय क्षेत्र की जानकारी देने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे ग्रह के आसपास के अंतरिक्षीय पर्यावरण को समझने में भी मदद मिल सकती है।

64 प्रकाशवर्ष दूर ग्रह की ‘रेडियो आवाज’ ने खोला नया रास्ता

बीटा पिक्टोरिस बी से मिले संकेत जीवन या एलियन सभ्यता का प्रमाण नहीं हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार ये पूरी तरह प्राकृतिक ऑरोरल प्रक्रिया से पैदा हुए हैं। फिर भी यह खोज इसलिए अहम है क्योंकि पहली बार किसी बाहरी ग्रह से आने वाले रेडियो उत्सर्जन को उसके मूल तारे से अलग करके सीधे ग्रह से जोड़ा गया है।

इसके साथ ही इस रेडियो उत्सर्जन ने वैज्ञानिकों को ग्रह के शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र को मापने का मौका दिया है। यानी 64 प्रकाशवर्ष दूर स्थित यह गैस दानव इंसानों को कोई संदेश नहीं भेज रहा, लेकिन उसकी ‘रेडियो आवाज’ ने वैज्ञानिकों को उसकी अदृश्य चुंबकीय दुनिया की पहली सीधी झलक जरूर दे दी है।

 

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