अमेरिका ने श्रीलंका पर कड़ा दबाव डाला, ईरानी सैनिकों को लौटाने से रोका; पाला बदलवाने की कोशिश की आशंका

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अमेरिका ने श्रीलंका सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि हाल ही में डुबाए गए ईरानी युद्धपोतों के जीवित बचे सैनिकों और हिरासत में मौजूद चालक दल को ईरान को वापस न भेजा जाए। यह कदम अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत ‘आईआरआईएस देना’ को टॉरपीडो से डुबाने के कुछ ही दिनों बाद आया है। इस हमले में 100 से अधिक ईरानी नौसैनिक मारे गए जबकि 32 को जीवित बचाया गया।

‘देना’ युद्धपोत पर अमेरिकी हमला

जानकारी के अनुसार, ‘देना’ युद्धपोत पिछले महीने बंगाल की खाड़ी में आयोजित भारत-शामिल नौसैनिक अभ्यास के बाद ईरान लौट रहा था। एक गुप्त अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि हमला करते समय जहाज पूरी तरह से हथियारों से लैस था और अमेरिका ने स्ट्राइक से पहले कोई चेतावनी नहीं दी। अमेरिकी रक्षा मंत्री ने इस हमले को “शांत मौत” करार दिया। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका द्वारा समुद्र में किसी युद्धपोत पर की गई पहली इस तरह की कार्रवाई मानी जा रही है।

दूसरे ईरानी जहाज ‘आईआरआईएस बुशहर’ की स्थिति

श्रीलंका ने गुरुवार को ‘आईआरआईएस बुशहर’ से 208 चालक दल के सदस्यों को सुरक्षित उतारना शुरू किया। यह जहाज श्रीलंका के विशेष आर्थिक क्षेत्र में फंसा था। अधिकांश चालक दल को कोलंबो के पास नौसेना शिविर में स्थानांतरित किया गया। अमेरिकी केबल के अनुसार, जब तक यह संकट जारी रहेगा, यह जहाज और चालक दल श्रीलंका की हिरासत में रहेंगे। श्रीलंका के राष्ट्रपति ने कहा कि द्वीपीय देश होने के नाते उन्हें शरण देना मानवीय जिम्मेदारी है।

अमेरिकी और इजरायली कूटनीतिक दबाव

रॉयटर्स द्वारा जारी अमेरिकी विदेश विभाग के आंतरिक दस्तावेज में खुलासा हुआ कि अमेरिका ने श्रीलंका पर जोर दिया कि न तो ‘बुशहर’ के चालक दल को और न ही ‘देना’ युद्धपोत के 32 जीवित बचे नौसैनिकों को ईरान भेजा जाए। अमेरिकी दूत ने इस बात का ध्यान रखने को भी कहा कि ईरान इन बंदियों का इस्तेमाल किसी भी तरह के प्रोपेगेंडा के लिए न कर सके। इसके अलावा, इजरायली राजदूत ने इस बात की पुष्टि की कि कहीं ईरानी चालक दल को पाला बदलने के लिए प्रोत्साहित तो नहीं किया जा रहा।

शवों की वापसी पर श्रीलंका का बयान

श्रीलंका के स्वास्थ्य और जनसंचार उप मंत्री ने बताया कि ईरान ने कोलंबो से ‘देना’ युद्धपोत पर मारे गए सैनिकों के शवों को वापस भेजने में मदद मांगी है, लेकिन अभी तक किसी समय-सीमा का निर्धारण नहीं किया गया। इस मामले पर अमेरिकी विदेश विभाग, श्रीलंकाई राष्ट्रपति कार्यालय और इजरायली दूतावास की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं आई है।

 

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