रमजान 2026 कब से शुरू होगा? जानें पहले रोजे की संभावित तारीख, सेहरी-इफ्तार के नियम और पाक महीने की खास इबादतें

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लखनऊ। रूहानियत, सब्र और इबादत का पाक महीना रमजान आने वाला है और दुनिया भर के मुसलमान इसकी तैयारी में जुटने लगे हैं। मस्जिदों में बढ़ती रौनक, कुरान की तिलावत की आवाज़ और इफ्तार की खुशबू—ये सब उस मुबारक दौर के आने का संकेत हैं जिसका हर साल बेसब्री से इंतजार रहता है। रमजान 2026 की तारीख को लेकर लोगों में उत्सुकता है, जिस पर मौलाना सैय्यद फ़ज़लुल्ल मन्नान रहमानी, शाही इमाम टीले वाली मस्जिद, लखनऊ ने विस्तृत जानकारी साझा की है।

पहला रोजा कब रखा जा सकता है
इस्लामिक हिजरी कैलेंडर के मुताबिक रमजान साल का नौवां और सबसे पवित्र महीना माना जाता है, जिसकी शुरुआत चांद दिखाई देने पर निर्भर करती है। मौलाना के अनुसार संभावना है कि 18 फरवरी 2026 की शाम शाबान का चांद नजर आने पर 19 फरवरी से पहला रोजा रखा जा सकता है। अगर चांद उसी दिन दिख जाता है तो उसी रात से तरावीह की नमाज भी शुरू हो जाएगी।

ईद-उल-फित्र की संभावित तारीख
रमजान 29 या 30 रोजों का होता है और इसके बाद शव्वाल महीने की पहली तारीख को ईद मनाई जाती है। अनुमान है कि अगर पहला रोजा 19 फरवरी से शुरू होता है तो 20 या 21 मार्च 2026 को देशभर में ईद-उल-फित्र मनाई जा सकती है। यह दिन इबादत के साथ शुक्राने, भाईचारे और खुशियों के इजहार का प्रतीक होता है।

सेहरी और इफ्तार का आध्यात्मिक महत्व
सेहरी सूर्योदय से पहले लिया जाने वाला भोजन है, जो सिर्फ खानपान नहीं बल्कि पूरे दिन के रोजे के लिए मानसिक और आध्यात्मिक तैयारी का हिस्सा माना जाता है। वहीं मगरिब की अजान के साथ खजूर और पानी से रोजा खोलना सुन्नत माना जाता है, जिसे इफ्तार कहा जाता है। इस दौरान सादगी, साझा भोजन और दुआ का वातावरण रमजान की असली रूह को दर्शाता है।

शबे कद्र और अलविदा जुमा की अहमियत
रमजान के आखिरी दस दिन बेहद खास माने जाते हैं। इन्हीं दिनों की विषम रातों—21वीं, 23वीं, 25वीं, 27वीं और 29वीं—में शबे कद्र की तलाश की जाती है, जिसे हजार महीनों से बेहतर बताया गया है। इसी अवधि में आने वाला आखिरी शुक्रवार अलविदा जुमा कहलाता है, जब मस्जिदों में अमन, सलामती और रहमत की विशेष दुआएं की जाती हैं।

जकात: बराबरी और इंसानियत का संदेश
रमजान का एक अहम पहलू जकात है, जो जरूरतमंदों की मदद का धार्मिक कर्तव्य माना जाता है। मौलाना के मुताबिक अपनी संपत्ति का तय हिस्सा जरूरतमंदों को देना अनिवार्य होता है, जैसे हर हजार रुपये पर लगभग 25 रुपये। इसका उद्देश्य समाज में आर्थिक संतुलन बनाना और सहानुभूति की भावना बढ़ाना है।

 

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