अगर आप भी सोचते हैं जब हम इनकम टैक्स ही नहीं देते, तो बजट देखने की क्या जरूरत? तो यह रिपोर्ट आपके लिए है

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Budget 2026 को लेकर अक्सर एक सवाल उठता है—“जब हम इनकम टैक्स ही नहीं देते, तो बजट देखने की क्या जरूरत?” अगर आप भी ऐसा सोचते हैं तो ये रिपोर्ट आपके लिए है। सच्चाई यह है कि बजट का असर सिर्फ टैक्स स्लैब में आने वालों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दिहाड़ी मजदूर, गिग वर्कर, गृहिणी और कम आय वाले हर परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी को सीधे प्रभावित करता है। इंडिया टीवी से खास बातचीत में देश के जाने-माने अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने विस्तार से समझाया कि 1 फरवरी 2026 को पेश होने वाला केंद्रीय बजट उन लोगों के लिए क्यों उतना ही अहम है, जिनकी महीने की कमाई 10 से 20 हजार रुपये है और जो इनकम टैक्स नहीं भरते।

इनकम टैक्स नहीं देने वालों को भी बजट पर क्यों रखनी चाहिए नजर?

आम धारणा के उलट, बजट सिर्फ टैक्सपेयर्स या कारोबारियों के लिए नहीं होता। अर्थशास्त्री अरुण कुमार के मुताबिक बजट देश की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा आर्थिक घटनाक्रम है, जिसका सीधा असर रोजगार, महंगाई और आम आदमी की क्रय शक्ति पर पड़ता है। बजट से यह तय होता है कि अर्थव्यवस्था में कितने रोजगार पैदा होंगे और रोजमर्रा की चीजों के दाम किस दिशा में जाएंगे। भले ही जीएसटी का फैसला बजट में सीधे न होता हो, लेकिन पहले के इनडायरेक्ट टैक्स और अब सरकार की खर्च नीतियों का असर आम आदमी की खरीदारी पर साफ दिखता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रेलवे जैसे सेक्टरों में सरकारी खर्च अंततः आम नागरिक की जिंदगी की गुणवत्ता तय करता है।

बजट और गृहिणी की रसोई का सीधा कनेक्शन

घर की अर्थव्यवस्था संभालने वाली गृहिणियों के लिए बजट बेहद अहम है। अरुण कुमार बताते हैं कि हर घर में खाने-पीने, तेल-साबुन और सफाई जैसी जरूरतों के लिए एक तय बजट होता है। इनडायरेक्ट टैक्स या सरकारी नीतियों में बदलाव का सीधा असर इन जरूरी सामानों की कीमतों पर पड़ता है। अगर महंगाई बढ़ती है तो घरेलू बजट बिगड़ता है, जिससे या तो खाने-पीने में कटौती करनी पड़ती है या बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य जैसे खर्च प्रभावित होते हैं। कई बार बढ़ती महंगाई गृहिणियों को भी काम पर जाने के लिए मजबूर कर देती है, जिससे उन पर घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारी का डबल बोझ आ जाता है।

गिग वर्कर्स के लिए बजट क्यों है बेहद जरूरी

आज देश में गिग वर्कर्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जिनकी न फिक्स सैलरी होती है और न ही सोशल सिक्योरिटी। अरुण कुमार के अनुसार बजट यह तय करता है कि असंगठित क्षेत्र कितना बढ़ेगा और रोजगार की गुणवत्ता कैसी होगी। अगर सरकार ऐसी नीतियां लाती है जिससे स्थायी और सुरक्षित रोजगार बढ़ें, तो गिग वर्कर्स को पीएफ, छुट्टी और सामाजिक सुरक्षा मिल सकती है। बजट में लिए गए फैसले ही यह तय करते हैं कि गिग वर्कर्स की हालत सुधरेगी या उन्हें ज्यादा भागदौड़ करनी पड़ेगी।

पोस्ट ऑफिस और छोटी बचत योजनाओं पर बजट का असर

कम आय वाले लोग शेयर बाजार के बजाय पोस्ट ऑफिस और छोटी बचत योजनाओं में निवेश करना पसंद करते हैं। हालांकि ब्याज दरें सीधे तौर पर रिजर्व बैंक तय करता है, लेकिन बजट की नीतियों से अगर महंगाई बढ़ती है या आर्थिक विकास धीमा होता है, तो आरबीआई को ब्याज दरों में बदलाव करना पड़ता है। इस तरह बजट का असर अप्रत्यक्ष रूप से आम आदमी की बचत पर भी पड़ता है, इसलिए बजट को समझना जरूरी है।

सब्सिडी, राशन और गैस: गरीब तबके की सबसे बड़ी उम्मीद

गरीब और कम आय वाले परिवारों के लिए राशन और गैस सिलेंडर पर मिलने वाली सब्सिडी जीवनरेखा जैसी होती है। अरुण कुमार बताते हैं कि ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत करीब 30 करोड़ असंगठित मजदूरों में से बड़ी संख्या की आय 10 हजार रुपये से भी कम है। ऐसी स्थिति में शिक्षा, स्वास्थ्य या अचानक बीमारी का खर्च उठाना मुश्किल हो जाता है। बजट में सब्सिडी का आवंटन घटता या बढ़ता है तो इसका असर तुरंत इन परिवारों की जेब पर दिखाई देता है। जब तक रोजगार और आय का स्तर नहीं सुधरता, तब तक सब्सिडी गरीब तबके के लिए बेहद जरूरी बनी रहती है।

10–20 हजार कमाने वाले व्यक्ति को बजट में क्या सुनना चाहिए?

अरुण कुमार की सलाह साफ है। कम आय वाले व्यक्ति को बजट भाषण में सबसे पहले रोजगार पर सरकार का फोकस देखना चाहिए। इसके बाद शिक्षा और स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च को ध्यान से सुनना चाहिए। साथ ही महंगाई को काबू करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं, इस पर नजर रखना जरूरी है। इन बिंदुओं से ही तय होगा कि बजट आम आदमी के लिए राहत लेकर आएगा या जेब पर बोझ बढ़ाएगा।

 

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