मिडटर्म चुनाव में ट्रंप को बड़ा झटका! संसद के दोनों सदनों में गंवाया बहुमत, अब हर बड़े फैसले पर लगेगी विपक्ष की नजर

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नई दिल्ली: अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को करारा झटका लगा है। चुनावी नतीजों के बाद संसद के दोनों सदनों में पार्टी बहुमत से बाहर हो गई है। हालांकि, ट्रंप राष्ट्रपति पद पर बने रहेंगे, लेकिन अब उनके लिए बाकी बचे दो साल का कार्यकाल पहले की तरह चलाना आसान नहीं होगा। प्रतिनिधि सभा और सीनेट में डेमोक्रेट्स की मजबूत स्थिति के चलते बजट, टैक्स, सरकारी नियुक्तियों और नीतिगत फैसलों पर उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इतना ही नहीं, ट्रंप सरकार के कामकाज की संसदीय जांच और महाभियोग की कोशिशों का खतरा भी बढ़ गया है।

प्रतिनिधि सभा और सीनेट में डेमोक्रेट्स का दबदबा

मिडटर्म चुनाव के नतीजों में डेमोक्रेटिक पार्टी ने दोनों सदनों में बढ़त हासिल की है। प्रतिनिधि सभा की कुल 435 सीटों में से खबर लिखे जाने तक डेमोक्रेट्स 228 सीटें जीत चुके थे। यह बहुमत के आंकड़े से 10 सीट ज्यादा है। वहीं, ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को केवल 139 सीटें मिली हैं। पिछले चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के पास प्रतिनिधि सभा की 220 सीटें थीं।

सीनेट की 100 सीटों में से 35 पर चुनाव हुए थे। नतीजों के बाद डेमोक्रेट्स की संख्या बढ़कर 54 हो गई, जबकि रिपब्लिकन पार्टी 44 सीटों पर सिमट गई। इस तरह दोनों सदनों में बहुमत गंवाने के बाद ट्रंप के लिए अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाना बड़ी चुनौती बन सकता है।

ट्रंप की हार के पीछे बताई जा रहीं तीन बड़ी वजहें

मिडटर्म चुनाव को आमतौर पर मौजूदा सरकार के कामकाज पर जनता की मुहर माना जाता है। इस बार रिपब्लिकन पार्टी की हार के पीछे महंगाई और आम लोगों से जुड़े कई मुद्दों को अहम वजह माना जा रहा है। इनमें पेट्रोल की बढ़ती कीमतें, रोजमर्रा की जरूरतों का महंगा होना और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी परेशानियां शामिल हैं। इसके अलावा ईरान युद्ध भी चुनाव में बड़ा मुद्दा बना।

दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने कई सख्त फैसले लिए थे। उस समय संसद के दोनों सदनों में रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत होने के कारण उन्हें अपने फैसले लागू कराने में आसानी होती थी। लेकिन अब राजनीतिक समीकरण बदल चुके हैं। डेमोक्रेट्स के बहुमत में आने से ट्रंप के फैसलों की समीक्षा और उनका विरोध दोनों बढ़ सकते हैं।

बजट से लेकर सरकारी नियुक्तियों तक बढ़ेगा विपक्ष का दखल

संसद के दोनों सदनों में बहुमत मिलने के बाद डेमोक्रेट्स को कई अहम संसदीय समितियों का नेतृत्व मिल सकता है। इससे उन्हें ट्रंप प्रशासन के कामकाज की निगरानी करने और उनके करीबी अधिकारियों की भूमिका की जांच कराने का अवसर मिलेगा।

बजट और टैक्स से जुड़े प्रस्तावों को मंजूरी दिलाना भी रिपब्लिकन पार्टी के लिए मुश्किल हो सकता है। डेमोक्रेट्स इन प्रस्तावों को रोकने या उनमें बदलाव कराने की कोशिश कर सकते हैं। इससे सरकारी कामकाज प्रभावित होने की आशंका है।

सीनेट में डेमोक्रेट्स की बढ़त का असर वरिष्ठ नियुक्तियों पर भी पड़ सकता है। अमेरिका में न्यायाधीशों, मंत्रिमंडल के सदस्यों और कई बड़े अधिकारियों की नियुक्तियों के लिए सीनेट की मंजूरी जरूरी होती है। ऐसे में ट्रंप के पसंदीदा उम्मीदवारों की नियुक्तियां अटक सकती हैं।

वीटो पावर के सहारे ट्रंप रोक सकेंगे फैसले

संसद में बहुमत गंवाने के बावजूद ट्रंप के पास राष्ट्रपति की वीटो शक्ति मौजूद रहेगी। इसके जरिए वे संसद से पारित किसी विधेयक को कानून बनने से रोक सकते हैं। अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद-1 और अनुच्छेद-2 के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है।

हालांकि, राष्ट्रपति का वीटो अंतिम फैसला नहीं होता। अगर प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों में किसी विधेयक को दोबारा दो-तिहाई बहुमत से मंजूरी मिल जाती है तो राष्ट्रपति के वीटो के बावजूद वह कानून बन सकता है।

ट्रंप ने अपनी प्रतिक्रिया में दावा किया था कि अगर उनका नाम भी चुनाव में होता तो नतीजे अलग होते। उन्होंने यह भी कहा कि वे अगले दो साल हर फैसले पर वीटो लगाते हुए नहीं बिताना चाहते।

क्या ट्रंप बन जाएंगे ‘लैम डक’ राष्ट्रपति?

अमेरिकी राजनीति में ऐसे राष्ट्रपति को ‘लैम डक’ कहा जाता है, जिसकी राजनीतिक ताकत और फैसले लागू कराने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है। मिडटर्म चुनाव में हार के बाद ट्रंप के सामने भी ऐसी स्थिति बन सकती है।

यह ट्रंप का दूसरा राष्ट्रपति कार्यकाल है। अमेरिकी संविधान के मुताबिक वे तीसरी बार राष्ट्रपति नहीं बन सकते। ऐसे में रिपब्लिकन पार्टी के भीतर अगले राष्ट्रपति उम्मीदवार को लेकर राजनीतिक खींचतान तेज हो सकती है। पार्टी के कई नेता भविष्य की राजनीति को देखते हुए ट्रंप से दूरी बना सकते हैं। इसका असर पार्टी के भीतर उनके प्रभाव पर भी पड़ सकता है।

डेमोक्रेट्स फिर ला सकते हैं महाभियोग का प्रस्ताव

प्रतिनिधि सभा में बहुमत मिलने के बाद डेमोक्रेट्स ट्रंप के खिलाफ तीसरी बार महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की कोशिश कर सकते हैं। हालांकि, महाभियोग प्रस्ताव लाने और राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए अलग-अलग संवैधानिक प्रक्रियाएं हैं।

सबसे पहले प्रतिनिधि सभा में महाभियोग प्रस्ताव पारित करना होगा। इसके बाद सीनेट में सुनवाई होगी। राष्ट्रपति को दोषी ठहराने और पद से हटाने के लिए सीनेट में दो-तिहाई बहुमत जरूरी है। मौजूदा राजनीतिक हालात में रिपब्लिकन पार्टी के कुछ सांसद भी ट्रंप से दूरी बना सकते हैं, खासकर तब जब पार्टी के नेता अगले राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी में अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश करेंगे।

एपस्टीन फाइल्स के मुद्दे पर भी घिर सकते हैं ट्रंप

मिडटर्म चुनाव में जीत के बाद डेमोक्रेट्स जेफ्री एपस्टीन से जुड़ी फाइलों के मामले में भी ट्रंप प्रशासन को घेर सकते हैं। अमेरिकी न्याय विभाग की ओर से यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन से संबंधित दस्तावेज जारी किए जा रहे हैं। हालांकि, इन्हें सार्वजनिक करने में देरी और दस्तावेजों में की गई काट-छांट को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

डेमोक्रेट्स अटॉर्नी जनरल से पूछ सकते हैं कि फाइलें जारी करने में देरी क्यों हुई और दस्तावेजों में बदलाव किस आधार पर किए गए। इस मामले में जांच की मांग भी उठ सकती है। ट्रंप एपस्टीन के साथ किसी भी तरह के संबंधों से इनकार करते रहे हैं, हालांकि दोनों की कई तस्वीरें सार्वजनिक हो चुकी हैं।

ट्रंप परिवार के कारोबार और क्रिप्टो कमाई पर भी उठ सकते हैं सवाल

मिडटर्म चुनाव में हार का असर ट्रंप के परिवार के कारोबारी हितों पर भी पड़ सकता है। वित्तीय खुलासों के आधार पर डेमोक्रेट्स ट्रंप और उनके परिवार से जुड़े कारोबार तथा वित्तीय लेनदेन की जांच की मांग उठा सकते हैं।

दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, ट्रंप ने वर्ष 2025 में अपने कारोबार से करीब 19 हजार करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की। उनके परिवार से जुड़े क्रिप्टो कारोबार भी जांच के दायरे में आ सकते हैं। दावा किया गया है कि ट्रंप ने वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल नाम के क्रिप्टो उपक्रम से करीब 4,730 करोड़ रुपये और ट्रंप मीम कॉइन से 5,676 करोड़ रुपये कमाए।

इसके अलावा, वर्ष 2025 में ट्रंप के नाम पर 20 हजार से अधिक शेयर सौदे होने की बात भी कही गई है। डेमोक्रेट्स का आरोप है कि राष्ट्रपति पद पर रहते हुए शेयरों की खरीद-बिक्री करना अनुचित है। ट्रंप के दामाद जेरेड कुश्नर से जुड़े कारोबारी सौदे भी सवालों के घेरे में आ सकते हैं। आरोप है कि मध्य-पूर्व में शांति दूत की जिम्मेदारी मिलने के दौरान कुश्नर को इस क्षेत्र से भारी वित्तीय मदद मिली थी। विपक्ष इसे पद के दुरुपयोग से जोड़कर उठा सकता है।

भारत पर क्या होगा असर, व्यापार समझौते में मिल सकता है फायदा?

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के नतीजे भारत के लिए भी अहम साबित हो सकते हैं। संसद में ट्रंप की ताकत घटने से उनकी एकतरफा नीतियों और टैरिफ संबंधी फैसलों पर निगरानी बढ़ सकती है। इससे उन देशों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिन्हें अमेरिका की ओर से आयात शुल्क बढ़ाने की धमकियां मिलती रही हैं। भारत भी ऐसे देशों में शामिल है।

अमेरिका भारतीय उत्पादों के लिए एक बड़ा बाजार है। ऐसे में वहां की आयात शुल्क नीति में बदलाव का सीधा असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ सकता है। भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता अब तक पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है। इसी महीने भारत दौरे पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इसे अंतिम चरण में बताया था। हालांकि, इस बयान को मिडटर्म चुनाव से पहले की राजनीतिक रणनीति के रूप में भी देखा गया।

चुनावी नतीजों के बाद भारत के सामने दो संभावनाएं बन सकती हैं। पहली, ट्रंप अपनी शर्तों पर व्यापार समझौता कराने के लिए भारत पर दबाव बढ़ा सकते हैं। दूसरी, संसद में उनकी राजनीतिक ताकत कम होने से भारत को बातचीत में बेहतर स्थिति मिल सकती है।

ट्रेड थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के मुताबिक, ट्रंप भारत पर समझौते के लिए दबाव बनाने के वास्ते अपनी कार्यकारी शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं। भारत की प्रमुख चिंता यह है कि अमेरिकी आयात शुल्क ऐसा हो, जिससे भारतीय कंपनियां वहां दूसरे देशों की कंपनियों के साथ बराबरी से मुकाबला कर सकें।

H-1B वीजा और इमिग्रेशन नीति पर भी पड़ सकता है असर

अमेरिका की वीजा और आव्रजन नीति पर भी मिडटर्म चुनाव के नतीजों का असर देखने को मिल सकता है। डेमोक्रेट्स के बहुमत में आने से आव्रजन संबंधी सख्त प्रस्तावों का विरोध तेज हो सकता है। इससे अमेरिका में H-1B वीजा पर काम कर रहे भारतीय पेशेवरों को राहत मिलने की संभावना बन सकती है।

कुल मिलाकर, मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की हार ने ट्रंप के बाकी कार्यकाल की राजनीतिक चुनौतियां बढ़ा दी हैं। राष्ट्रपति पद पर बने रहने के बावजूद अब उन्हें संसद में विपक्ष की मजबूत चुनौती का सामना करना पड़ेगा। इसका असर अमेरिका की घरेलू नीतियों, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, भारत-अमेरिका संबंधों और आव्रजन व्यवस्था तक दिखाई दे सकता है।

 

 

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