OBC क्रीमी लेयर विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, UPSC के 958 चयनित अफसरों को अब मिलेगी IAS-IPS समेत सेवाएं और कैडर
मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (एलबीएसएनएए) में इन अधिकारियों का प्रशिक्षण अब तक शुरू नहीं हो सका था। आमतौर पर सिविल सेवा परीक्षा में चयनित अधिकारियों का फाउंडेशन कोर्स अगस्त के आखिरी सप्ताह या सितंबर की शुरुआत में शुरू हो जाता है। आजादी के बाद यह पहला मौका बताया जा रहा है, जब फाउंडेशन कोर्स इस तरह रुका रहा। इस फैसले से भारतीय वन सेवा परीक्षा 2025 में चयनित 148 उम्मीदवारों के लिए भी सेवा आवंटन, प्रशिक्षण और नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ने का रास्ता साफ हुआ है।
क्या था ओबीसी क्रीमी लेयर का विवाद?
विवाद की मुख्य वजह ओबीसी आरक्षण के तहत क्रीमी लेयर तय करने में माता-पिता की सैलरी और आय को आधार बनाने का मामला था। सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को दिए गए अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि केवल माता-पिता के वेतन या आय के आधार पर उनके बच्चों को ओबीसी क्रीमी लेयर में शामिल नहीं किया जा सकता।
शुक्रवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने अपने पुराने फैसले को बरकरार रखा। पीठ ने माना कि संबंधित अभ्यर्थी ओबीसी की नॉन-क्रीमी लेयर श्रेणी में आते हैं और आरक्षण का लाभ पाने के पात्र हैं। ऐसे उम्मीदवारों को उनकी संबंधित चयन प्रक्रिया और योग्यता के आधार पर पद एवं सेवा आवंटित किए जाने का अधिकार है।
करीब 100 ओबीसी अभ्यर्थियों को भी मिलेगा फायदा
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से लगभग 100 ओबीसी अभ्यर्थियों को भी अपनी मेरिट के आधार पर विभिन्न सिविल सेवाओं में चयन का अवसर मिल सकता है। वर्ष 2016 के बाद से कई उम्मीदवारों के जाति प्रमाण पत्र इस आधार पर खारिज कर दिए गए थे कि वे क्रीमी लेयर के दायरे में आते हैं। इसके चलते उनका सिविल सेवा परीक्षा का चयन भी प्रभावित हुआ था।
इस फैसले का सीधा असर उन उम्मीदवारों पर पड़ेगा, जिनके माता-पिता सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू), निजी कंपनियों, स्कूलों या अन्य संस्थानों में कार्यरत हैं। ऐसे मामलों में केवल वेतन या आय को देखकर क्रीमी लेयर का दर्जा तय नहीं किया जा सकता। वर्ष 1993 के सरकारी आदेश के मुताबिक माता-पिता के पद की स्थिति और उसकी श्रेणी को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
वेतन के आधार पर क्रीमी लेयर तय करने पर क्यों उठा विवाद?
वर्ष 1993 के सरकारी आदेश में क्रीमी लेयर निर्धारित करने के लिए आय और संपत्ति की जांच के दौरान वेतन तथा कृषि से होने वाली आय को शामिल नहीं किया गया था। हालांकि, 2004 में सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और निजी कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारियों के वेतन को भी इस गणना में शामिल कर लिया। इसके बाद इस व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गईं।
अदालत ने माना कि सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में काम करने वाले ओबीसी अभिभावकों के बच्चों को सिर्फ वेतन के आधार पर आरक्षण से बाहर करना उचित नहीं है। उनके माता-पिता किस पद पर कार्यरत हैं और उस पद की सरकारी सेवा में किस श्रेणी के पद से समानता है, इस पहलू पर भी विचार किया जाना चाहिए।
कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के 2004 के स्पष्टीकरण में भी कहा गया था कि जहां निजी या सार्वजनिक क्षेत्र के पदों और सरकारी पदों के बीच समानता का निर्धारण नहीं हुआ है, वहां माता-पिता के वेतन को अन्य स्रोतों से होने वाली आय से अलग करके देखा जाना चाहिए। यह व्यवस्था कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान लागू नहीं हुई थी। बाद में केंद्र में भाजपा सरकार आने के दो साल बाद 2016 में इसे लागू किया जाने लगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जुड़े अहम पहलू
अदालत ने अपने फैसले में इसके लाभ और प्रभाव को लेकर कुछ महत्वपूर्ण बातें भी स्पष्ट की हैं।
- फैसले का लाभ सीमित: मार्च 2026 के फैसले में 2004 के सरकारी आदेश को रद्द करने का लाभ केवल उन अभ्यर्थियों को मिलेगा, जिन्होंने इस आदेश को अदालत में चुनौती दी थी।
- पुरानी नियुक्तियां रहेंगी सुरक्षित: जिन उम्मीदवारों की नियुक्ति पहले ही हो चुकी है और जिन्हें कैडर आवंटित किया जा चुका है, उनकी नियुक्तियों पर इस फैसले का कोई असर नहीं पड़ेगा।
- पूरी हो चुकी भर्तियां नहीं खुलेंगी: फैसले के आधार पर पहले से पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं और नियुक्तियों को दोबारा नहीं खोला जा सकेगा।
- लंबित मामलों पर विचार: समान परिस्थितियों वाले अभ्यर्थियों के अदालतों या अन्य सक्षम मंचों पर लंबित मामलों पर उनकी योग्यता और संबंधित तथ्यों के आधार पर विचार किया जा सकता है।
क्या है ओबीसी क्रीमी लेयर की व्यवस्था?
ओबीसी क्रीमी लेयर की अवधारणा सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक इंद्रा साहनी मामले के बाद सामने आई थी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अन्य पिछड़ा वर्ग के भीतर आरक्षण का लाभ अपेक्षाकृत पिछड़े और जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे। इसके तहत सामाजिक और आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत संपन्न वर्ग को आरक्षण के दायरे से बाहर रखा जाता है।
वर्ष 1993 में सरकारी सेवा से बाहर काम करने वाले लोगों के लिए आय की सीमा एक लाख रुपये सालाना निर्धारित की गई थी। बाद में 2004, 2008 और 2013 में इसमें बदलाव किए गए। वर्ष 2017 में इस सीमा को बढ़ाकर आठ लाख रुपये सालाना कर दिया गया था। तब से यह सीमा अपरिवर्तित है।
किन लोगों को माना जाता है क्रीमी लेयर में?
नियमों के तहत संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों, अखिल भारतीय सेवाओं और केंद्र तथा राज्य सरकारों के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के बच्चों को क्रीमी लेयर के दायरे में रखा जाता है। इसमें ग्रुप ए या क्लास वन के अधिकारी शामिल हैं, यदि माता-पिता में से कोई सीधे भर्ती होकर इस पद पर पहुंचा हो या 40 वर्ष की उम्र से पहले पदोन्नति के जरिए इस स्तर पर पहुंचा हो।
इसके अलावा केंद्र और राज्य सरकारों के ग्रुप बी या क्लास टू के अधिकारी, दोनों अभिभावकों के इस श्रेणी में होने की स्थिति में, तथा समान स्तर के पदों पर कार्यरत सार्वजनिक उपक्रमों के कर्मचारी भी निर्धारित नियमों के तहत इसके दायरे में आते हैं।
सशस्त्र बलों में लेफ्टिनेंट कर्नल से ऊपर के रैंक वाले अधिकारी, पेशेवर और व्यापार या उद्योग से जुड़े संपन्न लोग तथा निर्धारित आय और संपत्ति सीमा के दायरे में आने वाले व्यक्ति भी क्रीमी लेयर के मानकों में शामिल हैं।
हालांकि, वर्ष 2017 में कुछ सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के पदों और सरकारी पदों के बीच समानता निर्धारित की गई थी, लेकिन निजी कंपनियों, विश्वविद्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों और विभिन्न राज्य सरकारी संगठनों में काम करने वाले कर्मचारियों के पदों को लेकर यह मुद्दा पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सका था। इसी वजह से इन क्षेत्रों में कार्यरत अभिभावकों की आय के आधार पर उनके बच्चों को क्रीमी लेयर में रखने को लेकर विवाद बना हुआ था।
