बच्चों के लापता होने के मामलों में किसी नेटवर्क की भूमिका? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगी देशव्यापी जांच

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नई दिल्ली। देश के अलग-अलग हिस्सों से लगातार सामने आ रही बच्चों के लापता होने की घटनाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह यह पता लगाए कि इन घटनाओं के पीछे किसी देशव्यापी गिरोह या राज्य-स्तरीय संगठित नेटवर्क की भूमिका तो नहीं है। अदालत ने कहा कि यह जांच जरूरी है कि क्या बच्चों के गायब होने की घटनाएं किसी तय पैटर्न का हिस्सा हैं या फिर अलग-अलग, आकस्मिक मामले हैं।

डेटा के विश्लेषण पर सुप्रीम कोर्ट का जोर
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने केंद्र सरकार से सभी राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों से लापता बच्चों से जुड़े आंकड़े एकत्र कर उनका विस्तृत विश्लेषण करने को कहा। पीठ ने स्पष्ट किया कि बिना समग्र डेटा के यह तय नहीं किया जा सकता कि इन घटनाओं के पीछे संगठित अपराध काम कर रहा है या नहीं।

केंद्र सरकार की दलील
केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि कुछ राज्यों ने लापता बच्चों और उनसे जुड़े अभियोजन के आंकड़े उपलब्ध करा दिए हैं, लेकिन करीब एक दर्जन राज्यों ने अब तक अपना डेटा साझा नहीं किया है। उन्होंने कहा कि जब तक सभी राज्यों से पूरी जानकारी नहीं मिलेगी, तब तक किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचना मुश्किल होगा।

बचाए गए बच्चों से पूछताछ का सुझाव
सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि जिन बच्चों को बरामद किया गया है, उनसे बातचीत कर यह जानने की कोशिश की जाए कि इन घटनाओं के पीछे कौन जिम्मेदार है। पीठ ने उन राज्यों पर नाराजगी भी जताई, जिन्होंने अब तक आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए हैं, और संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर सख्त आदेश पारित किए जा सकते हैं।

एनजीओ की याचिका पर सुनवाई
यह मामला एक एनजीओ ‘गुड़िया स्वयं सेवी संस्थान’ की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिका में कई राज्यों में लापता बच्चों की संख्या में लगातार हो रही बढ़ोतरी को रेखांकित किया गया है। इससे पहले 9 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को पिछले छह वर्षों का राष्ट्रव्यापी डेटा उपलब्ध कराने और केंद्रीय गृह मंत्रालय में एक समर्पित अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश दिया था, ताकि राज्यों के साथ बेहतर समन्वय हो सके।

पहले भी चेतावनी दे चुका है सुप्रीम कोर्ट
शीर्ष अदालत पहले भी सभी राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों को बच्चों की गुमशुदगी के मामलों की निगरानी के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश दे चुकी है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि लापता बच्चों से जुड़ी जानकारी महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के पोर्टल पर तुरंत अपलोड की जाए। 18 नवंबर 2025 को एक मीडिया रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए अदालत ने चिंता जताई थी कि भारत में हर आठ मिनट में एक बच्चा लापता हो जाता है।

गोद लेने की जटिल प्रक्रिया पर भी चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि देश में गोद लेने की प्रक्रिया जटिल है, जिससे इसके दुरुपयोग की आशंका बढ़ जाती है। अदालत ने केंद्र सरकार से इस प्रक्रिया को सरल बनाने को कहा था, ताकि अवैध तरीकों से बच्चों की खरीद-फरोख्त पर रोक लगाई जा सके।

 

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